Chandrayaan-3 Mission: चंद्रमा तक पहुंचने की भारत की यात्रा बयां करती यह किताब
नई दिल्ली। वर्तमान रुझानों को देखते हुए अमेरिका और चीन जैसे देशों के बीच सुदूर ग्रहों के लिए होड़ हो सकती है, लेकिन भारत को ऐसी किसी भी दौड़ से खुद को दूर रखना चाहिए। यह बात एक किताब में कही गई है। किताब में यह भी कहा गया है कि प्रौद्योगिकी गहन परियोजना के साथ चंद्रयान-3 मिशन की सफलता भारत की क्षमता को अच्छी तरह प्रदर्शित कर चुकी है।
‘चंद्रयान-3: इंडिया ऑन द मून’ नामक किताब में मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान के सलाहकार अजय लेले ने चंद्रयान-3 मिशन का सिंहावलोकन और भारत के चंद्र कार्यक्रम के घटनाक्रम का उल्लेख किया है। यह 2000 के दशक की शुरुआत से लेकर चंद्रमा तक भारत की यात्रा को भी रेखांकित करती है। लेखक का कहना है कि चंद्रयान-3 मिशन की सफलता भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए अच्छी है और यह ऐसी प्रौद्योगिकी गहन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए भारतीय प्रणाली की क्षमता को प्रदर्शित करती है, जिससे अंतरिक्ष क्षेत्र में अधिक निवेश आकर्षित होने की उम्मीद है।
‘रूपा पब्लिकेशन’ द्वारा प्रकाशित किताब में उन्होंने लिखा है, ‘‘आर्थिक दृष्टिकोण से अंतरिक्ष भविष्य के लिए एक आशाजनक क्षेत्र के रूप में उभर रहा है और यह कहा जा सकता है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम समय पर फल-फूल रहा है। भारत का चंद्रयान-3 वैज्ञानिक, तकनीकी और व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारत विकासशील देशों के समूह में है जिन्हें ‘ग्लोबल साउथ’ का हिस्सा माना जाता है।’’
‘ग्लोबल साउथ’ शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर आर्थिक रूप से कम विकसित देशों को संदर्भित करने के लिए किया जाता है। लेले किताब में यह भी सवाल करते हैं कि क्या भारत तथाकथित ‘चंद्र दौड़’ का हिस्सा है? लेखक ने कहा है, ‘‘भारत के लिए इस ‘दौड़’ में शामिल होने का कोई कारण नहीं है। सिर्फ इसलिए कि कुछ देश लगभग उसी अवधि के आसपास चंद्रमा तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, इसे यह नहीं माना जाना चाहिए कि भारत दौड़ जीतने की कोशिश कर रहा है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा शीतयुद्ध के युग की सत्ता की राजनीति का एक निर्णायक हिस्सा थी।’’
लेखक के अनुसार, आज हर देश अपनी तकनीकी और वित्तीय क्षमताओं के आधार पर अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों की योजना बना रहा है। उन्होंने लिखा है, ‘‘यह अच्छी तरह से समझा जाता है कि देश चंद्रमा पर मौजूद संसाधनों के लिए वहां जा रहे हैं। लेकिन साथ ही, देश समझते हैं कि अकेले यात्रा एक व्यावहारिक विकल्प नहीं है, इसीलिए आर्टेमिस कार्यक्रम (चंद्रमा के लिए अमेरिका एवं अन्य देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों का संयुक्त कार्यक्रम) जैसे विचार रखे गए हैं। चीन और रूस भी चंद्र गलियारे जैसा कुछ स्थापित करने के इच्छुक हैं।’’
लेले ने लिखा, ‘‘आज, चंद्रमा पर जाने वाले देशों के पास विभिन्न स्तर की विशेषज्ञता है। कुछ अभी शुरुआती चरण में हैं जबकि कुछ के बहुत विकसित कार्यक्रम हैं। यह कहना कि भारत जैसा देश चंद्रमा की कक्षा में एक अंतरिक्ष यान स्थापित करने की इच्छा के साथ, पहले ही चंद्रमा के लिए सफल अभियान को अंजाम दे चुके दूसरे देशों के साथ दौड़ में है, यह भ्रामक है।’’
लेले ने कहा कि वर्तमान रुझानों को देखते हुए मुख्य रूप से अमेरिका और चीन सुदूर ग्रहों तक पहुंचने की होड़ में होंगे। हालांकि, उनका सुझाव है कि भारत जैसे देशों को ‘‘खुद को ऐसी किसी भी होड़ से दूर रखना चाहिए।’’ उन्होंने लिखा, ‘‘चंद्रयान-3 की सफलता हमें इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) की क्षमताओं के बारे में बताती है कि वे भविष्य में क्या हासिल कर सकते हैं। इसके अलावा, इसरो के सभी प्रमुख अंतरिक्ष अन्वेषण देशों के साथ अच्छे संबंध हैं और उसे संयुक्त सहयोग की योजना बनाने के बारे में सोचना चाहिए। अब, समय आ गया है कि भारत अपने चंद्र एजेंडे को स्पष्ट रूप से बताए और अपने भविष्य की कार्ययोजना बनाए।’’
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