लखनऊ : टकायसु आर्टेराइटिस बीमारी को लेकर अमेरिका के मानक निकले गलत, एसजीपीजीआई के शोध में हुआ खुलासा

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लखनऊ, अमृत विचार। टकायसु आर्टेराइटिस बीमारी की जानकारी और इलाज के लिए अमेरिका और यूरोप की तरफ से तय किये गये मानक में बदलाव की जरूरत है। इस बात का खुलासा संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में हुये शोध में सामने आया है। संस्थान में क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी और रुमेटोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रो. दुर्गा प्रसन्ना मिश्रा की तरफ से किये गये शोध में अभी तक इस बीमारी के लिए बनाये गये मानक खरे नहीं उतरे हैं। डॉ. दुर्गा ने अमेरिका व यूरोप की सोसायटी को इसमे बदलाव का सुझाव दिया है।

इस बात की जानकारी डॉ. दुर्गा ने बुधवार को एसजीपीजीआई में चतुर्थ शोध दिवस पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान दी है।

दरअसल, जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बीमारियों के खिलाफ काम न करके जब अपने ही धमनियों को नुकसान पहुंचाने लगती हैं तब टकायसु आर्टेराइटिस बीमारी की संभावना बढ़ जाती है। इस बीमारी में हार्ट से खून को ले जानी वाली धमनी सिकुड़ जाती है। यह बीमारी 20 से 40 साल की महिलाओं में अधिक पाई जाती है। उन्होंने बताया कि कई बार धमनी में सूजन की वजह से रक्तचाप की जांच कराते समय पल्स नहीं मिलती है। इससे भी इस बीमारी को पकड़ा जा सकता है। सूजन खत्म होने के बाद भी धमनी छोटी हो जाती है। इससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक और आंतों में दिक्कत का भी खतरा बना रहता है। भारत में यह बीमारी अधिक लोगों में पाई जाती है।

उन्होंने बताया कि इस बीमारी में मृत्यु होने की 15 से 17 गुना संभावना अधिक होती है। कई बार इस बीमारी में कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते। ऐसे में इस बीमारी को समय रहते पहचानने और इसके इलाज को खोजने की जरूरत है। अभी तक दुनिया में इस बीमारी को पहचानने और इलाज के लिए उचित कार्य नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि एसजीपीजीआई में करीब 250 मरीज इलाज के लिए आ रहे हैं। 

डॉ. दुर्गा प्रसन्ना मिश्रा ने 504 मरीजों पर शोध कर इस बात का पता लगाया है कि टकायसु आर्टेराइटिस बीमारी को समय रहते पकड़ने के लिए जो मानक अमेरिका और यूरोपीय सोसाइटी की तरफ से बनाया गया था। वह उचित नहीं है। उन्होंने बताया जो मानक तय किये गये है उसके हिसाब से इस बीमारी की जानकारी करना और उसका इलाज देना उचित नहीं है। बीमारी की सटीक जानकारी के लिए मानक में सुधार की जरूरत है। 

डॉ. दुर्गा का यह शोध यूके की रोमेटोलॉजी सोसायटी के जनरल में प्रकाशित हो चुका है।

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