Allahabad High Court: हिरासत के लिए अंतिम आदेश पारित होने के बाद सरकार को समीक्षा का अधिकार नहीं

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 की धारा 12(1) से संबंधित मामले में कहा कि उक्त अधिनियम के तहत हिरासत का पुष्टिकरण आदेश या अंतिम आदेश पारित हो जाने के बाद राज्य सरकार पुनः उसकी समीक्षा नहीं कर सकती है। कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 13 में निर्धारित अगर किसी आदेश में हिरासत की कोई अवधि निर्धारित नहीं है तो ऐसी हिरासत अधिकतम 12 महीने की अवधि के लिए मान्य होगी। 

हालांकि राज्य सरकार द्वारा उक्त धारा के तहत आदेश पारित कर अगर हिरासत की अवधि निर्धारित कर दी गई है तो ऐसा हिरासत आदेश केवल निर्धारित अवधि के लिए ही वैध होगा और निर्धारित अवधि की समाप्ति के बाद हिरासत स्वयं समाप्त हो जाएगी। ऐसे आदेश की समीक्षा या विस्तार नहीं किया जा सकता है। 

हालांकि परिस्थितियों की मांग के अनुसार हिरासत में लेने वाला प्राधिकारी यानी राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट उक्त अधिनियम की धारा 3(2) के तहत एक नया हिरासत आदेश पारित कर सकता है और  जिसकी पुष्टि उपरोक्त अधिनियम की धारा 3,10, 11 और 12 के तहत की जानी आवश्यक है। 

वर्तमान मामले में याची का प्रारंभिक हिरासत आदेश जिला मजिस्ट्रेट, हापुड़ द्वारा 30 जनवरी 2023 को पारित किया गया, जिसमें याची को 3 महीने की अवधि के लिए हिरासत में रखने का निर्देश दिया गया था। इस प्रकार 3 महीने की समाप्ति के बाद याची की हिरासत अवैध हो जाती है। 

इस पृष्ठभूमि पर सुनील चाचुड़ा की याचिका स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने आक्षेपीत आदेशों को रद्द कर याची को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया, क्योंकि दोनों आदेश अवैध और गैर कानूनी थे। 

मामले के अनुसार 30 जनवरी 2023 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 की धारा 3(2) के तहत हापुड़ के जिला मजिस्ट्रेट ने याची के लिए हिरासत आदेश पारित किया। उक्त आदेश को राज्य सरकार के अनुमोदन के बाद 7 फरवरी को सलाहकार बोर्ड के पास भेजा गया, जिसकी रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद 13 मार्च को उक्त अधिनियम की धारा 12(1) के तहत अंतिम आदेश पारित किया गया। 

इसके बाद याची को प्रारंभिक हिरासत आदेश की तारीख से 3 महीने की अवधि के लिए हिरासत में लिया गया था और अंततः 27 अक्टूबर 2023 को हिरासत की निर्धारित अवधि को 12 महीने तक के लिए बढ़ा दिया गया, जिसे याची ने हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी।

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