लखनऊ : प्रदेश सरकार के बजट से कर्मचारियों में मायूसी, कहा- हमें अकेला छोड़ा गया

Amrit Vichar Network
Published By Amrit Vichar
On

लखनऊ, अमृत विचार। उत्तर प्रदेश सरकार ने वित्त वर्ष 2024-25 के लिए राज्य के बजट का आकार बढ़ाकर 7,36,437.71 करोड़ रुपये कर दिया है। इसमें 24,863.57 करोड़ रुपये की नई योजनाएं शामिल हैं। राज्य के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने सोमवार को विधानसभा में बजट पेश किया। यह राज्य का अब तक का सबसे बड़ा बजट है, लेकिन इस बजट से कर्मचारी नाखुश है। कर्मचारियों की मानें तो निश्चित ही प्रदेश में जनहित की अनेक योजनाएं दी गई हैं, लेकिन कर्मचारियों को अकेला ही छोड़ दिया गया है। 36 पेज के बजट भाषण में अनेक योजनाओं, समूहों को लाभ दिया गया, लेकिन प्रदेश के कर्मचारी जो शासकीय नीतियों का परिपालन सुनिश्चित करते हैं। उनके लिए कोई योजना नहीं आई। ठेका और संविदा कर्मचारियों के बारे में भी नहीं सोंचा गया है।

कर्मचारियों की बात

फार्मासिस्ट फेडरेशन के अध्यक्ष सुनील यादव ने कहा कि प्रदेश में स्थाई कर्मचारियों से अधिक संख्या ठेकेदारी और संविदा कर्मियों की होती जा रही है इसलिए सरकार को इनके कल्याण के लिए योजना लानी चाहिए। स्थाई करण, स्थाई नौकरियों में वरीयता दी जा सकती है। इस बजट में फार्मा सेक्टर को अतिरिक्त तरजीह नहीं दी गई जो चिंतनीय है । वास्तव में प्रदेश में अपार संभावनाएं हैं जहां स्थाई रोजगार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए । हालांकि कैशलेश चिकित्सा के लिए धन आवंटित होने को स्वागत योग्य बताया है।

कर्मचारी हितों को किया गया नजरअंदाज

राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद ने प्रदेश सरकार के बजट में पुरानी पेंशन बहाली की घोषणा न किए जाने सहित कर्मचारी हितों को नजरंदाज किए जाने का आरोप लगाते हुए बजट को कर्मचारी हितों के प्रतिकूल बताया है। परिषद के  महामंत्री अतुल मिश्रा और फेडरेशन के महामंत्री अशोक कुमार ने कहा कि कर्मचारियों की मांग थी कि पुरानी पेंशन बहाल की जाए लेकिन बजट में कोई घोषणा नहीं की गई, इसलिए कर्मचारियों के लिए यह बजट आशा के विपरीत रहा है। परिषद ने स्थाई रोजगार सृजन की दिशा में कोई योजना ना होने पर भी चिंता व्यक्त की है ।

परिषद के अनुसार निजीकरण की योजनाएं कभी भी जनहित में नहीं हो सकती इसलिए सरकार को स्थाई रोजगार की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए । संविदा प्रथा और ठेकेदारी प्रथा को समाप्त करने के स्थान पर बढ़ावा दिया जा रहा है, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में सभी पदों पर संविदा पर भर्ती की जाती है, स्थाई रोजगार सृजन ना होने से तकनीकी योग्यता धारक लोगों को या तो बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है या अल्प वेतन और भविष्य की असुरक्षा के बीच कार्य करना पड़ रहा है । संविदा कर्मचारियों को अपने मानदेय बढ़ाने का भी इंतजार था जो पूरा नहीं हुआ । पीपीपी मॉडल पर जो मेडिकल कॉलेज बनाए जा रहे हैं उनमें भी स्थाई रोजगार की घोषणा नहीं है अतः यह बजट कर्मचारी हितों के प्रतिकूल है । 

बुढ़ापे की लाठी है ओल्ड पेंशन स्कीम : सीमा शुक्ला

सीमा

एसजीपीजीआई के नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन की पूर्व अध्यक्ष सीमा शुक्ला ने कहा है कि पिछले कई सालों से ओल्ड पेंशन स्कीम को लेकर स्थायी सरकारी कर्मचारी आंदोलन कर रहे हैं। इतना ही नहीं चुनावों में यह मुद्दा भी रहता है, लेकिन कर्मचारियों के बुढ़ापे की लाठी को छीन लिया गया है। इस पर सरकार को विचार करना चाहिए। ओल्ड पेंशन स्कीम के अलावा उसकी जगह पर कोई अन्य स्कीम होने पर भी कर्मचारियों को कोई फायदा नहीं होगा। यही वजह है कि रविवार को पूरे प्रदेश से आये कर्मचारियों ने ओल्ड पेंशन स्कीम को लेकर मार्च भी किया था। आज बजट से यह उम्मीद थी कि कर्मचारियों की इस समस्या के समाधान के लिए सरकार कुछ करेगी, लेकिन पेंशन के मामले में कुछ नहीं हुआ।

कर्मचारियों की घोर उपेक्षा, बजट है खट्टा

केजीएमयू स्थित लिंब सेंटर के पूर्व कार्यशाला प्रबंधक अरविंद निगम ने कहा है कि केंद्र सरकार की मंशा के अनुरूप प्रदेश सरकार का बजट है, सारे तबके के कर्मचारियों की घोर उपेक्षा की गई है, संविदा कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि की बात हमेशा शासन के अधिकारी करते रहे हैं पर बजट में उनको उपेक्षित किया गया है, ops के मुद्दे पर सरकार चुप्पी साधे है, चुनावी वर्ष होने के बावजूद बजट आम ही है , वो भी खट्टा।

यह भी पढ़ें : बस्ती : मतस्य पालन और बागवानी से बदलेगी सूरत, किसानों की आय दोगुना करने के लिए युद्ध स्तर पर हो रहा कार्य

संबंधित समाचार