Behmai Kand: घटना से लेकर फैसले तक कानूनी दांवपेंच में उलझा रहा बेहमई कांड... अचानक गायब हो गई थी मूल केस डायरी
कानपुर देहात के बेहमई कांड में 20 लोगों की लाइन में लगाकर गोली मारकर हत्या की गई थी
कानपुर देहात, अमृत विचार। बहुचर्चित बेहमई कांड के मामले में बुधवार को अदालत ने फैसला भले ही सुना दिया हो, लेकिन घटना से लेकर 43 साल तक लगातार उलझाव की स्थिति बनी रही। ऐसे में लंबी चली कानूनी प्रक्रिया के चलते कई आरोपियों से लेकर वादी व गवाहों की मौत तक हो गई।
सिकंदरा थाना क्षेत्र के बेहमई गांव में 14 फरवरी 1981 को दस्य सुंदरी फूलन देवी ने गिरोह के साथ बीस लोगों का नरसंहार किया था। मुकदमा लिखे जाने के बाद 7 अप्रैल 1981 से 31 अक्तूबर 1982 के बीच आठ चार्जशीट दाखिल हुई। इसके बाद से ही उलझाव की शुरू हो गया था।
वर्ष 1995 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने फूलन पर लगा मुकदमा वापस ले लिया था। लेकिन तत्कालीन विशेष न्यायाधीश डकैती एसके सक्सेना ने सरकार के इस फैसले को खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद अगस्त 2012 में फरार तीन डकैतों की पत्रावली अलग कर सुनाई कराई गई।
वर्ष 2012 में ही मौजूदा जिला शासकीय अधिवक्ता राजू पोरवाल ने बेहमई कांड के मुकदमे की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद आरोपी भीखा, पोसा, श्यामबाबू, विश्वनाथ व राम सिंह की फाइल अलग कर अगस्त 2012 में आरोप तय किए गए। घायलों समेत पंद्रह गवाहों के बयान कराकर 2014 में गवाही भी खत्म कर दी गई थी।

सुनवाई के दौरान महेशपुर के आरोपी विश्वनाथ ने 23 नवंबर 2015 में नाबालिग होने का प्रमाण पत्र लाकर मामले में फिर से पेंच फंसा दिया था। जिसका समाधान होने के बाद जनवरी 2020 को फैसले के ऐन वक्त से पहले मुकदमे की मूल केस डायरी गायब होने से मामला फिर से लटक गया।
एडीजीसी प्रशांत मिश्रा बताते हैं कि बेहमई कांड की सुनवाई के दौरान कई बार पीठासीन अधिकारियों के स्थानांतरण के चलते फिर से बहस शुरू की गई।
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