संरक्षित खेती प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता: कुलपति

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पंतनगर, अमृतविचार। पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डा. तेज प्रताप द्वारा फसल अनुसंधान केंद्र पर भ्रमण कर धान की सीधी बिजाई प्रक्षेत्र की जानकारी ली। उन्होंने कहा कि पूरी फसल के साथ संरक्षित खेती प्रक्रिया को अपनाए जाने की आवश्यकता है, जिससे कम लागत एवं कम समय में कम प्रक्षेत्र से ज्यादा से ज्यादा उत्पादन प्राप्त …

पंतनगर, अमृतविचार। पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डा. तेज प्रताप द्वारा फसल अनुसंधान केंद्र पर भ्रमण कर धान की सीधी बिजाई प्रक्षेत्र की जानकारी ली। उन्होंने कहा कि पूरी फसल के साथ संरक्षित खेती प्रक्रिया को अपनाए जाने की आवश्यकता है, जिससे कम लागत एवं कम समय में कम प्रक्षेत्र से ज्यादा से ज्यादा उत्पादन प्राप्त किया जा सके।

उन्होंने कहा कि अन्य शोध केंद्रो पर इस तकनीक को अपनाना जाना चाहिए, जिससे किसान ज्यादा से ज्यादा आय प्राप्त कर सकें। निदेशक शोध डॉ. एएस नैन ने बताया कि वर्तमान समय में कृषि श्रमिकों की उपलब्धता, पानी की कमी, खेत की मृदा शक्ति में कमी तथा पर्यावरण प्रदूषण समस्याओं को ध्यान में रखते हुए किसानों को धान की सीधी बुवाई कार्यक्रम को अपनाना अत्यधिक लाभकारी होगा। यदि अच्छी प्रकार से धान की खेती सीधी बुवाई विधि के वैज्ञानिक तौर तरीकों से की जाती है तो रोपाई की अपेक्षा 3-5 प्रतिशत उपज भी ज्यादा प्राप्त होती है।

इस तकनीक के द्वारा धान की फसल भी 8-10 दिन पहले ही परिपक्व हो जाती है और रबी फसल की समय से बुवाई कर अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष फसल अनुसंधान केंद्र पर 40 है। प्रक्षेत्र में धान की सीधी बिजाई के तहत प्रजनक बीजोत्पादन किया गया है इसके बाद इस प्रक्षेत्र में शून्य जुताई या सुपर सीडर से गेहूं की बिजाई कर वही उत्पादन प्राप्त किया जाएगा जो पारंपरिक विधि से गेहूं की बिजाई से प्राप्त होता है और गेहूं की उत्पादन लागत में की कमी के साथ-साथ समय से बिजाई संभव हो जाएगी।

केंद्र के संयुक्त निदेषक डॉ. वी प्रताप सिंह ने बताया कि इसके लिए खेत समतल होना चाहिए ताकि सीड ड्रिल समान रुप से बीज एवं खाद गिराए व खेत की सतह पर पानी सामान रूप से वितरित हो। इसकी बुवाई जून के मध्य में करें जिससे वर्षा शुरू होने तक पौधा पूर्णतः स्थापित हो जाए। साथ ही अच्छे जमाव के लिए भूमि में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि इसमें जिंक की कमी के लक्षण दिखाई देने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट 2.0 प्रतिशत यूरिया का घोल बनाकर पानी के साथ खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए। इस दौरान महाप्रबंधक फार्म डा. डीके सिंह, सहनिदेशक, फसल अनुसंधान केंद्र डा. आरपी मौर्य सहित डा. एसपी सिंह, डा. अवनीश कुमार एवं समीर चतुर्वेदी आदि वैज्ञानिक उपस्थित रहे।

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