अल्मोड़ा: नाराज मतदाताओं के घावों पर लगने लगा मरहम 

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

अल्मोड़ा, अमृत विचार। पांच सालों में आम आदमी की बुनियादी समस्याओं से सरकारी तंत्र भले ही आंख क्यों न चुराता हो पर चुनावों के वक्त अगर मतदाताओं ने अपनी समस्याओं को लेकर चुनाव बहिष्कार की चेतावनी मात्र से प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते हैं। यही कारण है कि हर चुनावों में अपनी मांग मनवाने के लिए चुनाव बहिष्कार के मामलों में लगातार इजाफा होता जा रहा है।

इस बार के लोकसभा चुनाव में भी सरकारी तंत्र को कुछ ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है और नाराज मतदाताओं के घावों पर मरहम लगाने के लिए अधिकारियों का गांव गांव पहुंचना शुरू हो गया है। 

अल्मोड़ा लोकसभा सीट सीमांत पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और अल्मोड़ा जिलों को मिलाकर बनी है। यहां आज भी अनेक ऐसे क्षेत्र हैं। जहां के लोग बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, संचार, स्वास्थ्य जैसी सेवाओें के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। सियासतदार चुनावों के दौरान इन समस्याओं को दूर करने का वायदा तो करते हैं। लेकिन चुनाव के बाद न नेता उनकी सुध लेना मुनासिब समझते हैं और न ही सरकारी तंत्र खामियों को ढर्रे पर लाने का कोई प्रयास करता है।

वर्तमान लोकसभा चुनाव की बात करें तो जिले के करीब पंद्रह से बीस गांवों के लोगों ने अपनी विभिन्न समस्याओं के लिए चुनाव बहिष्कार की चेतावनी दी है। इनमें  अल्मोड़ा जिले के झीपा, टनौला, डभरा, हटौला, बरगेटी, कसाण, तलस्यारी, दलमोटी, क्ववैराला, खाईकट्टा, गिरचोला, खदेरागांव समेत अनेक गांव शामिल हैं।

ऐसे में अब जहां प्रशासन के सामने शत प्रतिशत मतदान कराने की चुनौती है, वहीं नाराज मतदाताओं को मनाना भी किसी टेड़ी खीर से कम नहीं है। सीडीओ आकांक्षा कोंडे की मानें तो चुनाव बहिष्कार वाले गांवों की सूची तैयार कर उनसे बातचीत की जा रही है। उन्होंने कहा है कि नाराज ग्रामीणों को लोकतंत्र के इस पर्व पर भागीदारी के लिए प्रेरित किया जा रहा है। 

संबंधित समाचार