Kanpur: मोबाइल और टीवी पैदा कर रहे ऑटिज्म डिसऑर्डर; लगातार बढ़ रहे केस, बच्चों में हो रहीं ये दिक्कतें...

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Edited By Amrit Vichar
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पहले साल में आते थे एक या दो केस, अब हर माह चार केस

कानपुर, अमृत विचार। कई बच्चों को बोलने व चीजों को ठीक तरीके से समझने में दिक्कत होती है। ऐसे बच्चों में विकासात्मक समस्याओं का खतरा हो सकता है, जो बच्चों के शारीरिक विकास को प्रभावित करने के साथ ही मस्तिष्क पर भी नकारात्मक असर डालती है, जिसे मेडिकल भाषा में ऑटिज्म या ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर कहा जाता है। ये मस्तिष्क के विकास से संबंधित समस्याओं का समूह है। मोबाइल व टीवी की वजह से यह समस्या बच्चों में बढ़ी है। 

प्रतिवर्ष दो अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरुकता दिवस मनाया जाता है, इस बार की थीम इस डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों की आवाज को मजबूती देना है, जिससे समाज में ऐसे लोगों के प्रति स्वीकार्यता बढ़े और वह भी अच्छी जिंदगी और बेहतर करियर की दिशा में आगे बढ़ सकें। 

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में मानसिक रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. धनजंय चौधरी के मुताबिक माता-पिता से विरासत में मिले जीन में किसी प्रकार के दोष के कारण बच्चों में विकासात्मक समस्या होने का खतरा होता है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करने वाली स्थिति है, जो व्यक्ति के दूसरों के साथ मेलजोल और सोचने के तरीके को प्रभावित करती है। 

इसके कारण प्रभावित बच्चे के सामाजिक संपर्क में समस्या होती है। ऑटिज्म के लक्षण मुख्यरूप से बचपन में ही दिखने लग जाते हैं। इससे पीड़ित बच्चे को बाते समझने में कठिनाई होती है, मन ही मन बड़बड़ाते हैं, शब्दों को समझ नहीं पाते हैं, आंखें मिलाकर बात नहीं कर पाते हैं, उठने-बैठने और खाने-पीने का बर्ताव भी औरों से अलग थोड़ा होता है। 

उर्सला के मनोरोग चिकित्सक डॉ. डॉ.चिरंजीव प्रसाद ने बताया कि वर्तमान में बच्चे वर्चुअल ऑटिज्म के शिकार के आ रहे हैं, इनकी संख्या लॉकडाउन के बाद बढ़ी है। लॉकडाउन से पहले बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म के साल में एक या दो केस ही आते थे। लेकिन अब महीने में तीन से चार मामले आ रहे हैं। 

क्योंकि बच्चों के दिमाग का विकास दो से पांच साल की उम्र में होता है। इसी समय बच्चा नई-नई चीज सीखता है, दूसरों की बात समझता है और अपनी बात कहता है। ऐसे समय में बच्चों के हाथ में मोबाइल देने पर उनका मानसिक और शारीरिक विकास ठीक तरह से नहीं हो पाता है। ऐसे में अभिभावकों को बच्चों को मोबाइल से दूर रखना चाहिए। 

बचाव के लिए यह जरूरी

1. बच्चों को दो घंटे से ज्यादा मोबाइल न दें।
2. दस साल तक के बच्चे आठ घंटे तक सोएं।
3. अभिभावक बच्चों के साथ ज्यादा वक्त बिताएं।

इन लक्षणों से करें बीमार की पहचान 

1. बच्चा जब बोलने में देरी करे। 
2. हमेशा फोन की मांग करना। 
3. परिजनों व किसी से भी नजर न मिलाना।
4. नाम पुकारने पर अनसुना करना। 
5. सोचने व समझने की क्षमता कम होना।
6. उठने-बैठने और खाने-पीने का बर्ताव अलग होना।

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