अंतर्राष्ट्रीय मातृ दिवस: बूढ़ी औरतें...औलाद के पैरों पर खड़े होने तक मां थीं फिर बन गईं बोझ

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दिल को झकझोरने वाली हैं वृद्धाश्रम में जिंदगी बिता रही मांओं की कहानियां

अनुपम सिंह/बरेली, अमृत विचार : वे बुखारा के वृद्धाश्रम में जिंदगी के आखिरी पड़ाव का सफर तय कर रही हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि उनका दुनिया में कोई नहीं है। किसी के बेटे अफसर हैं तो किसी के कारोबारी, लेकिन उनका साथ तभी तक रहा जब तक वे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो गए। तभी तक वे उन्हें मां कहकर बुलाते थे और उनके आगे-पीछे घूमते थे। पैरों पर खड़े होने के बाद धीरे-धीरे यह एहसास जागा कि वे बूढ़ी औरतें जिन्हें वे मां कहते थे, वे उनके लिए बोझ बन गई हैं और उनके खुशहाल वैवाहिक जीवन में कड़वाहट घोल रही हैं। बेटों की इसी बदली समझ ने उन्हें वृद्धाश्रम पहुंचा दिया।

बुखारा के वृद्धाश्रम में रह रही ज्यादातर मांओं की एक जैसी कहानी है। कुछ की थोड़ी कम तो कुछ की ज्यादा दर्दनाक। जीवन भर संघर्ष के बाद आखिर में बच्चों से ही पराजित हो जाने की इनकी दास्तां जब जुबां से फूटती है तो सुनने वाले को भी एक सन्नाटे में छोड़ देती है। कई बरसों से वे वृद्धाश्रम में जिंदगी काट रही हैं और अब अपनी औलाद से कोई उम्मीद नहीं बची है लेकिन इसके बाद भी उनका चेहरा देखने के लिए तड़पती रहती हैं। वह मां भी खुद को सौभाग्यशाली मानती है जिसकी बरस दो बरस में यह आस पूरी हो जाती है। शायद यही जज्बा होता है जो एक मां को मां बनाता है।

अफसर बेटे के बोल- तुम्हें सरकार से मदद मिल रही है, आराम से रहो, मुझे मेरे परिवार के साथ रहने दो
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल की रहने वाली सावित्री अब 80 की उम्र पार कर चुकी हैं। दो बेटे और एक बेटी छोटी ही थी, तभी पति दुनिया से गुजर गए थे। काेई सहारा नहीं था इसलिए काम की तलाश में एक सहेली के साथ बरेली चली आईं और यहां एयरपोर्ट के पास जैसे-तैसे रहने का बंदोबस्त कर लिया। बच्चों के पालन-पोषण और पढ़ाई के लिए अफसरों के घर में खाना बनाने और सफाई का काम करना शुरू कर दिया।

तमाम साल यही सब करते दोनों बेटों और बेटी को पढ़ाया। उनका यह संघर्ष रंग लाया और दाेनों बेटों को एयरफोर्स में नौकरी मिल गई। बेटी भी शिक्षक बन गई। तीनों की एक-एक कर शादी होने के बाद सावित्री को उनके नसीब ने रंग दिखाने शुरू कर दिए। तिरस्कार सहते हुए लंबा समय गुजरा और आखिर में बच्चों ने साथ रखने से ही इन्कार कर दिया। 

कई बरस पहले सावित्री वृद्धाश्रम चली आईं और अब तक यहीं रह रही हैं। बोलीं, बच्चों की याद बहुत आती है। छोटे बेटे की बहू बरेली में ही रहती है। कुछ दिन पहले बेटा भी आया हुआ था। वृद्धाश्रम की प्रबंधक से फोन कराया तो शुक्रवार रात वह उनसे मिलने आया। सावित्री यह बताते हुए फफककर रो पड़ीं कि बेटा यह कहकर लौट गया कि तुम्हें सरकार से मदद मिल रही है, हमें परेशान मत करो। तुम आराम से यहां रहाे और मुझे मेरे परिवार के साथ रहने दो।

बेटा ख्याल रखता था, बहू को बर्दाश्त नहीं हुआ तो घर छोड़कर वृद्धाश्रम आना पड़ा
सुभाषनगर की रहने वाली सत्यवती की उम्र 19 साल की थी जब पति गुजर गए। उनके दो बेटे हैं। एक 18 साल की उम्र में ही घर छोड़कर दिल्ली चला गया। जैसे-तैसे दिन कटते रहे। पति अपने पीछे कुछ जमीन छोड़ गए थे। उसमें से कुछ उनके परिवार वालों ने हड़प ली। बाकी बड़े बेटे ने बेच दी और अलग हो गया। छोटा बेटा उनका ख्याल रखता था लेकिन शादी के बाद यह बात उसकी पत्नी को अखरने लगी। घर में आए दिन विवाद होने लगा। रोज-रोज के क्लेश से परेशान होकर सत्यवती अपना ही घर छोड़कर वृद्धाश्रम में आ गईं, तब से यहीं रह रहीं हैं। बोलीं, दिल पर बहुत बड़ा पत्थर रख लिया है। बेटे के लिए मुंह से आशीर्वाद ही निकलेगा। मां हूं, बद्दुआ ताे नहीं निकलेगी।

बहू बताती थी कूड़ा-कचरा, बेटा भी देने लगा साथ तो छोड़ आईं घर
गजपुरा माफी की रहने वाली प्रेमवती के दो बेटे और एक बेटी है। बेटे किसान हैं और प्राइवेज नौकरी भी करते हैं। बड़े बेटे की शादी के बाद घर में बहू आई तो कहने लगी कि घर से कूड़ा-कचरा निकालो। बेटे का भी व्यवहार बदलने लगा। एक दिन इसी बात पर विवाद होने के बाद बहू जहर खाकर अस्पताल पहुंच गई। उसी दिन प्रेमवती ने घर छोड़ दिया और वृद्धाश्रम में आकर रहने लगी। बोलीं, अपना घर छोड़ना आसान नहीं होता, बच्चों की फूलों की तरह देखभाल की थी। बेटों के किए पर प्रेमवती को गुस्सा भी है। कहने लगीं, सरकार को ऐसे मामलों में सख्ती दिखानी चाहिए। कार्रवाई हो ताकि मांओं को वृद्धाश्रम न आना पड़े और उनका बुढ़ापा न बर्बाद हो।

झगड़ालू बहू की वजह से बीमार पति के साथ ओमवती भी वृद्धाश्रम में
आंवला की ओमवती पैरालाइसिस के शिकार पति शिवदयाल के साथ नौ महीने पहले ही वृद्धाश्रम में आई थीं। दो बेटे हैं, बड़ा बेटा पिता के लिए दवा लाता था और देखभाल भी करता था लेकिन बहू को यह ठीक नहीं लगता था। घर में अक्सर लड़ाई झगड़े होते थे। एक दिन बहू ट्रेन से कटने की धमकी देकर घर से चली गई। किसी तरह उसे रोका, उसके बाद दोनों लोग वृद्धाश्रम आ गए।

बुजुर्गों की होती है देखभाल
समाज कल्याण विभाग की ओर से संचालित बुखारा के वृद्धजन आवास गृह की प्रबंधक कांता गंगवार बताती हैं कि यहां रहने वाले बुजुर्गाें की पूरी देखभाल की जाती है। साल में दो बार कपड़े दिए जाते हैं। खाने-पीने की पूरी व्यवस्था रहती है। बीमार होने पर इलाज भी कराया जाता है। बुजुर्गाें की इच्छा के अनुसार घरवालों से बात भी कराई जाती है। यहां फिलहाल 127 बुजुर्ग रह रहे हैं जिनमें 49 महिलाएं और 78 पुरुष हैं।

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