बरेली: जिस मशीन ने किस्मत बना दी...उसे कैसे घर से हटा दें, राजेंद्र अग्रवाल को है भावनात्मक लगाव

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Edited By Amrit Vichar
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नरकुलागंज में बरसों पहले खत्म हो गया खांडसारी उद्योग लेकिन एक घर से अब तक नहीं हटी खांड बनाने की मशीन

बरेली, अमृत विचार। कभी गल्ला मंडी के नाम से जाने जाने वाले नरकुलागंज में अब मंडी के नाम की यादें ही रह गई हैं। किसी जमाने में यहां घर-घर कोई न कोई व्यवसाय होता था। खांडसारी मंडी भी लगती थी। खांड बनाने की करीब सौ यूनिट थीं जो समय गुजरने के साथ तमाम बरस पहले ही खत्म हो चुकी हैं लेकिन राजेंद्र अग्रवाल के घर में एक मशीन फिर भी लगी हुई है। वजह वह भावनात्मक लगाव है जो कारोबारी सफर में बरसोंबरस इस मशीन के साथ निभाने से पैदा हुआ।

राजेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि 1971 में जब वह 17 साल के थे, तब उनके पिता ने यह मशीन लगवाई थी। नरकुलागंज में तब खांड बनाने का खूब काम होता था। स्कॉटलैंड से मंगाई गई मशीन जब यहां पहुंची तो घर में जश्न का माहौल था। उस समय दो हजार रुपये खर्च करके यह मशीन लगाई गई थी। यह रकम उनके पिता ने कितना संघर्ष करके इकट्ठी की, वह उन्हें आज भी महसूस होता है लेकिन मशीन लगने के बाद दिन बदलने शुरू हो गए।

राजेंद्र बताते हैं कि उस वक्त दो से तीन रुपये क्विंटल गन्ना खरीदा जाता था। नरकुलागंज में ही तमाम कोल्हू भी लगे हुए थे। मशीन लगने के बाद काफी व्यवसाय चला। वर्ष 1990 के बाद खांडसारी उद्योग धीरे धीरे बंद होने लगा। सभी कारोबारियों ने मशीनों को हटाकर दूसरे व्यवसाय शुरू कर दिए। उन्हें भी उनके बच्चों ने कई बार सलाह दी कि मशीन को बेचकर काफी पैसे मिल जाएंगे लेकिन वह कभी इस मशीन को हटाने का निर्णय नहीं ले पाए। बच्चे भी अब मशीन को बेचने की बात नहीं करते।

एक मशीन से कई लोगों को मिलता था रोजगार
राजेंद्र अग्रवाल ने बताया कि गुजरे जमाने में जिस कारोबारी के पास यह मशीन होती थी, वह कम से कम 40 लोगों को रोजगार देता था। कोई टिन का पीपा उठाता था तो कोई पैर से गन्ने को धकेलता था। राब को लाने और सुखाने के लिए अलग लोग होते थे। उन्होंने बताया कि गुड़ से राब बनाने के बाद उसे मशीन में डालकर फेंटने से उसका मैलापन निकल जाता था और केमिकल मुक्त शुद्ध खांड निकल आती थी। अब कंप्यूटर युग में सब खत्म हो गया है।

उत्तराखंड में थी बरेली की खांड की सर्वाधिक मांग
राजेंद्र के मुताबिक बरेली में बनी खांड की उत्तराखंड में बहुत मांग थी। बाद में हल्द्वानी में भी यह काम होने लगा और वहीं से पहाड़ों में सप्लाई होने लगी। पहाड़ों में खांड की अब भी मांग है। वक्त के साथ इस खांड को सफेद और सुंदर बनाने के लिए क्रेशर लग गए जिनमें सल्फर, फास्फेट और कैल्शियम का प्रयोग होने लगा। खांड की जगह चीनी ने ली तो नरकुलागंज में खांडसारी उद्योग का अंत हो गया।

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