हाईकोर्ट ने लगाई फटकार, नोएडा स्पोर्ट्स सिटी घोटाले में सीबीआई जांच के आदेश
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा स्पोर्ट्स सिटी घोटाले में सीबीआई जांच के आदेश देते हुए मामले से संबंधित बिल्डरों, कंसोर्टियम और नोएडा प्राधिकरण के दोषी अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने के निर्देश दिए हैं। उक्त आदेश न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने मेसर्स थ्री सी ग्रीन डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड और 8 अन्य की याचिका को निस्तारित करते हुए पारित किया।
कोर्ट ने मौजूदा मामले को बिल्डरों और नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों के गंदे गठजोड़ का एक ज्वलंत उदाहरण बताया, जहां बिल्डरों को लाभ पहुंचाने के लिए योजना के कार्यान्वयन के विपरीत नीतियों का निर्माण किया गया । आश्चर्य की बात यह है कि कई वर्षों में नोएडा प्राधिकरण में अनेक अधिकारी आए, लेकिन किसी ने भी इस घोटाले के बारे में कोई कार्रवाई नहीं की और न ही बकाया राशि वसूलने का प्रयास किया बल्कि खेल नगर के सभी आवंटियों, उप-पट्टेदारों को अनुचित लाभ देना जारी रखा, जो नोएडा प्राधिकरण और राज्य सरकार के हितों के विपरीत था।
कोर्ट ने प्राधिकरण के अधिकारियों की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा कि स्पोर्ट्स सिटी परियोजना की शुरुआत से ही नोएडा प्राधिकरण की कार्यवाही अनुचित, तर्कहीन, अवैध और धोखाधड़ी से भरी हुई थी। प्रशासनिक निर्णय परियोजना की योजना, ब्रोशर और पट्टे की शर्तों और आवंटन पत्र के विपरीत थे, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा, इसलिए मौजूदा मामले में कोर्ट का तत्काल हस्तक्षेप करना आवश्यक हो गया। कोर्ट ने मामले के दौरान प्रस्तुत तथ्यों का न्यायिक संज्ञान लेते हुए कहा कि मौजूदा तथ्य दर्शाते हैं कि न केवल याची कोर्ट में गंदे हाथों और गलत इरादों से आए बल्कि नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों के इरादे भी उतने ही गलत थे, जिससे संसाधनों और राजस्व की भारी हानि हुई है।
मामले के अनुसार नोएडा प्राधिकरण ने पहली बार 16 अगस्त 2004 को स्पोर्ट्स सिटी परियोजनाओं के विकास का प्रस्ताव रखा, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में विश्व स्तरीय खेल सुविधाएं स्थापित करना था। 25 जून 2007 की बैठक में परियोजना के लिए पूरे नोएडा में 311.60 हेक्टेयर भूमि की पहचान की गई। 8 अप्रैल 2008 की बोर्ड बैठक में स्पोर्ट्स सिटी के लिए निर्धारित भूमि को बढ़ाकर 346 हेक्टेयर कर दिया गया, जिसमें सेक्टर 76, 78, 79, 101,102, 104 और 107 शामिल थे। यह निर्णय आगामी राष्ट्रमंडल खेल 2010 के लिए भी था। परियोजना को आकार देने के लिए ग्रांट थार्नटन को योजना का मसौदा तैयार करने और भूमि आवंटन के लिए दिशा निर्देश स्थापित करने के लिए नियुक्त किया गया। सितंबर 2010 में एक महत्वपूर्ण बदलाव के साथ स्पोर्ट्स सिटी के लिए प्रस्तावित कुल भूमि क्षेत्र 311 हेक्टेयर से घटाकर 150 हेक्टेयर कर दिया गया। ग्रांट थार्नटन को फिर से एक संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंपा गया, जिससे भविष्य में आवंटन के लिए आरक्षित मूल्य का निर्धारण किया जा सके। वर्ष 2010-11 और 2015-16 के बीच 798 एकड़ में चार स्पोर्ट्स सिटी परियोजनाएं शुरू की गईं, जिसमें तीन गोल्फ कोर्स, अंतरराष्ट्रीय मानकों का एक क्रिकेट स्टेडियम और अंतरराष्ट्रीय मानकों की अन्य खेल सुविधाओं की योजना बनाई गई थी।
यह मामला उक्त चार परियोजनाओं में से एक से संबंधित है, जहां खेल सुविधा से संबंधित कोई विकास नहीं हुआ है, लेकिन आवंटियों/बिल्डरों ने पहले ही परियोजना के उस हिस्से का मुद्रीकरण कर लिया है, जिसका उद्देश्य खेल सुविधाओं के निर्माण पर आई लागत की वसूली करना था। अंत में कोर्ट ने तथ्यों की जांच से पाया कि नोएडा प्राधिकरण द्वारा किए गए पहले घोटाले में उसने भूखंडों को छोटे-छोटे भूखंडों में विभाजित कर अन्य छोटे बिल्डरों को बेच दिया, जो स्वतंत्र रूप से बोली लगाने के योग्य भी नहीं थे, जिससे सरकारी खजाने को हानि हुई, क्योंकि इसे ग्रुप हाउसिंग भूखंड मानकर नया आवंटन किया गया तथा हस्तांतरण के लिए कोई स्टांप शुल्क भी नहीं दिया गया। यह प्लॉट बहुत कम कीमत पर आवंटित किए गए थे, जिसकी बिक्री निश्चित रूप से प्रीमियम पर होती।
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