कर्म, आस्था और अविनाशी विश्वास की धरती काशी 

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Edited By Anjali Singh
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वैसे तो यात्राएं मैं बहुत करता हूं, लेकिन आज जिस यात्रा का जिक्र यहां करूंगा वो हर व्यक्ति से जुड़ी हुई होगी। शहर बनारस या फिर वाराणसी कहिए, लेकिन मैं अपनी काशी यात्रा के बारे में बताऊंगा। काशी जिसे मोक्ष की नगरी, शिव की स्थली और धर्म की राजधानी कहा जाता है। मेरे लिए केवल एक यात्रा नहीं, आत्मा से साक्षात्कार का निमंत्रण था, जब इस बार जब मैंने काशी की ओर रुख किया। वाराणसी रेलवे स्टेशन पर उतरते ही एक अजीब ऊर्जा ने मुझे घेर लिया। हवा में गंगा की नमी थी और कानों में शंखध्वनि की गूंज। मैंने निश्चय किया कि इस बार मैं केवल घाटों और विश्वनाथ मंदिर तक ही नहीं रुकूंगा, बल्कि उन जगहों की खोज करूंगा जो इतिहास के पन्नों में छिपी हैं।--शिवेंद्र सिंह बघेल

कर्दमेश्वर महादेव मंदिर

वाराणसी की भीड़भाड़ और गलियों के बीच एक ऐसा स्थान है, जहां पहुंचते ही मन में शांति उतर आती है- कर्दमेश्वर महादेव मंदिर। यह मंदिर काशी के उन प्राचीन और कम चर्चित शिवालयों में से एक है, जिनके बारे में आम पर्यटक तो क्या कई स्थानीय लोग भी कम जानते हैं। मैं एक सुबह गंगा आरती के बाद घाटों से होते हुए कर्दमेश्वर की ओर निकला। बनारस की संकरी गलियों में पैदल चलते हुए, पान की दुकानों की खुशबू, मंदिरों की घंटियों की धुन और गंगा के तट की ठंडी हवा, सभी मिलकर यात्रा को अद्भुत बना रहे थे। रास्ते में एक बुजुर्ग पंडित जी मिले, जिनसे बात करते हुए पता चला कि कर्दमेश्वर महादेव का महत्व स्कंद पुराण में भी वर्णित है। मान्यता है कि यहां स्वयं भगवान शिव ने कर्दम मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए थे।

मंदिर पहुंचते ही सामने एक पुरातन शैली की संरचना नजर आई, जिस पर समय की परतें साफ झलकती थीं। द्वार पर नंदी महाराज विराजमान थे, जैसे आने-जाने वालों पर दृष्टि रखे हों। गर्भगृह में प्रवेश करते ही वातावरण में गूंजते “ॐ नमः शिवाय” के स्वर और जलाभिषेक की बूंदों की ठंडक ने तन-मन को भिगो दिया। वहां के पुजारी ने बताया कि सावन और महाशिवरात्रि के समय यहां विशेष मेला लगता है, लेकिन सामान्य दिनों में यहां का सन्नाटा और शांति ही इसकी असली पहचान है। मंदिर के पीछे एक छोटा सा कुंड भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि कर्दम मुनि यहीं स्नान कर ध्यान लगाया करते थे। पानी में झांकते हुए लगा जैसे समय रुक गया हो। चारों ओर मंदिर की दीवारें, ऊपर नीला आसमान और मन में गूंजता शिव नाम।

जंगमबाड़ी मठ

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जंगमबाड़ी मठ, काशी का एक प्रमुख वीरशैव मठ है, जो दक्षिण भारत की दार्शनिक परंपराओं को उत्तर भारत से जोड़ता है। इस मठ में प्रवेश करते ही एक शांति का अनुभव होता है। यहां की दीवारों पर उकेरी गई लिपियां, ताम्रपत्र और योगी परंपरा के चिह्न उस काल की गाथा कहते हैं, जब संत ज्ञानेश्वर और बसवन्ना की वाणी उत्तर भारत में भी गूंजती थी। यहां पर बताया की लाखों की संख्या में शिवलिंग मौजूद हैं। मठ के अंदर साधुओं का जीवन, तप और अनुशासन देखकर मन श्रद्धा से भर गया। हिंदी भाषा के कई ग्रंथ यहां के पुस्तकालय में सुरक्षित हैं, जिनमें भाषा, व्याकरण और दर्शन का अपूर्व समन्वय मिलता है।

लोलार्क कुंड

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लोलार्क कुंड का उल्लेख पुराणों में मिलता है। कहा जाता है कि यहां सूर्य देव स्वयं प्रकट हुए थे। यह कुंड ‘संतान प्राप्ति’ की कामना से जुड़ा है, विशेषकर लोलार्क छठ के अवसर पर यहां स्नान और पूजा का विशेष महत्व है। मैंने देखा-महिलाएं सिर पर दीप रखकर सीढ़ियों से उतर रही थीं। कोई तांबे के पात्र में जल भर रहा था, तो कोई तिल चढ़ा रहा था। श्रद्धा का वह दृश्य शब्दों में बांधना कठिन है। इस स्थल की विशेषता यह है कि यह आस्था और विज्ञान का सम्मिलन है। कुंड की बनावट, जल का तापमान और उसकी संरचना में भारतीय वास्तुशास्त्र की स्पष्ट छाप दिखती है। यह नगरी जितनी प्राचीन है, उतनी ही नवीन। कर्दमेश्वर महादेव ने सिखाया कि कर्म ही पूजा है, जंगमबाड़ी ने दर्शन की गहराई से अवगत कराया और लोलार्क कुंड ने यह बताया कि आस्था, विज्ञान और परंपरा जब एकत्र होती हैं, तब काशी जन्म लेती है। यह यात्रा मेरे जीवन की एक पूर्ण विराम नहीं, बल्कि नवीन अनुच्छेद की शुरुआत है। काशी से जुड़े रहने की, उसे समझने की और आत्मा से जुड़ने की।