अध्यात्म:मन
संपूर्ण संसार में यदि सर्वाधिक शक्तिशाली कोई है, तो वह है मन। मन को किसी ने देखा नहीं है, किंतु मन के अंदर शक्तियों का अपार भंडार विद्यमान है। एक सूक्ति है, ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’। मन के अंदर असीम क्षमताएं एवं संभावनाएं विद्यमान हैं। जिस प्रकार हम पदार्थ के सूक्ष्मतम कण अर्थात परमाणु को नहीं देख पाते, किंतु उसमें अपार ऊर्जा सन्निहित है। ठीक उसी प्रकार मन कोई भौतिक वस्तु नहीं है, जिसके दर्शन कर पाना संभव हो। मन हमारे भौतिक शरीर से संबद्ध एक ऐसा भाग है, जिसका वर्णन भौतिक पैमाने पर किया जाना संभव नहीं है। मन को केवल अनुभव किया जा सकता है। मन के अस्तित्व के बिना शरीर का अस्तित्व भी पूर्णतया अर्थहीन ही होता है।
मन को शरीर का सारथी कहा गया है, क्योंकि शरीर पूर्णतया मन के अधीन रहता है। यह मन की शक्तियों का ही परिणाम है कि शरीर बड़े-बड़े उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को सिद्ध कर लेता है। अनेक ऐसे कारक हमारे चहुंदिश विद्यमान रहते हैं, जो मन को सदैव पतन की ओर अग्रसर करने के लिए प्रवृत्त होते हैं। बाह्य संसार, विभिन्न प्रकार के अनुभव, विषम परिस्थितियां, विभिन्न प्रकार के आवेग एवं भाव इत्यादि कुछ ऐसे ही कारक हैं। किंतु इन सभी कारकों के प्रभाव को एक अमोघ अस्त्र की सहायता से निष्क्रिय किया जा सकता है, वह अमोघ अस्त्र है-आत्मबल।
आत्मबल से युक्त मन संसार का सर्वोत्तम एवं सर्वशक्तिमान अस्त्र है। आत्मबल को अपने भीतर जगाने के लिए हमें कहीं न कहीं अनावश्यक बाह्य तत्वों के फंदे से स्वयं को बाहर निकलना होगा। इसके लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम अपना पूर्ण ध्यान स्वयं पर केंद्रित करें। ऐसा होने पर बाह्य कारक, जो निरंतर हमें विचलित करने का प्रयास करते रहते हैं, हमारे ऊपर लेशमात्र प्रभाव भी नहीं डाल पाएंगे। हमें मन की शक्ति को पहचानते एवं स्वीकारते हुए अपने प्रत्येक लक्ष्य को मन के हवाले करके आत्मबल का स्तर निरंतर ऊपर उठाने का प्रयास करते रहना चाहिए। ऐसा होते ही हम अपने जीवन में एक अभूतपूर्व परिवर्तन देखेंगे।- प्रेरणा अवस्थी
