बोध कथा: सांच को नहीं आंच

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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स्वामी विवेकानंद ने युवावस्था में ही अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व विकसित कर लिया था, जो उनसे मिलता, उनकी प्रतिभा का कायल हो जाता। उनके अंग्रेज प्राध्यापक भी उनसे प्रभावित रहते थे। एक बार उनके कॉलेज के प्रिंसिपल डब्ल्यू. डब्ल्यू हेस्टी उनकी कक्ष में आए। किसी प्रसंग पर उन्होंने पूछा, ‘नरेंद्र! यह बताओ नास्तिक कौन है?’ यह सुनकर नरेंद्र ने कहा, ‘सर, नास्तिक वह होता है, जो अपने में विश्वास नहीं करता। ईश्वर में विश्वास नहीं करता।’ इस उत्तर को सुनकर हेस्टी साहब कुछ देर के लिए अवाक रह गए। फिर उन्होंने कुछ सोचकर कहा ‘तो इसका अर्थ यह है कि इश्वर कहीं नहीं है।’

इस पर नरेंद्र ने दृढ़तापूर्वक कहा, ‘ईश्वर है सर। वह भारत के उन दरिद्र पंडित और दुर्बल लोगों में है, जिन्हें कभी तुर्क और मुगल शासक नोचते रहे और आजकल आपकी सरकार नोच रही है।’ इस निर्भीक उत्तर को सुनकर हेस्टी साहब चकित रह गए। उन्होंने कहा, ‘मैंने सुदूर देशों का भ्रमण किया है, पर अभी तक मुझे कहीं भी ऐसा लड़का नहीं मिला, जिसमें तुझ जैसी प्रतिभा और संभावनाएं हों। तू जीवन में जरूर अपनी छाप छोड़ जाएगा।’ 

इतना कहकर हेस्टी साहब कक्ष से बाहर चले गए। छुट्टी के समय उन्होंने नरेंद्र को अपने ऑफिस में बुलाया फिर बड़े प्यार से बिठाते हुए कहने लगे, ‘नरेंद्र तुमने क्लास में मुझ जो कुछ कहा, वह बिल्कुल सच है, लेकिन मैं तुम्हें हिदायत देता हूं कि ऐसी बातें किसी और अंग्रेज के सामने मत कहना, कभी मत कहना।’ नरेंद्र ने पूछा, ‘क्यों सर?’ 

हेस्टी साहब बोले, ‘वह तुम्हारी रिपोर्ट कर देगा और सरकार तुम्हें जेल भेज सकती है।’ यह सुनकर नरेंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘सर! यदि सच बोलने से आपकी सरकार मुझे जेल भेज देगी, तो मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि भारत का हर व्यक्ति मेरी तरह सच कहने लगे और आपकी सरकार सबको जेल का पानी पिलाने लग जाए।’ -सुरेन्द्र अग्निहोत्री, लेखक