बुराई के पुतले जलाते चलो, प्रेम की दुनिया बसाते चलो
रावण के पुतले का दहन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना भी है जो अच्छाई की बुराई पर विजय, व्यक्तिगत विकास और सामुदायिक एकता को बढ़ावा देती है। यह पर्व यह सिखाता है कि हमें अपने जीवन में अच्छाई का पालन करना चाहिए और बुराई से दूर रहना चाहिए।
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दशहरा भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है जो हर साल नवरात्रि के समापन पर मनाया जाता है। इस दिन रावण के पुतले का दहन एक महत्वपूर्ण परंपरा है । अगर हम इस प्रतीक और संकेत को समझें तो रावण को एक दुष्ट और अहंकारी राजा के रूप में चित्रित किया गया है, और उसका वध आत्मज्ञान और अहंकार के विनाश का प्रतीक है।
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असत्य और अहंकार के त्याग का संदेश देते रावण के पुतले
रावण दहन धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्व रखता है। यह भगवान राम के धर्म के प्रति अडिग रहने और न्याय की स्थापना के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यह दिन श्रद्धालुओं को धर्म और कर्तव्यों के पालन की याद भी दिलाता है। दशहरा का मुख्य धार्मिक अर्थ भगवान राम द्वारा रावण का वध करना है। रावण ने माता सीता का अपहरण किया था और भगवान राम ने अपने भाई लक्ष्मण और वानर सेना की मदद से उसे हराया। साथ ही दशहरा को देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय के साथ भी जोड़ा जाता है। इस दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया, जो बुराई का प्रतीक था।
तेजी से बनाए जा रहे पुतले
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रावण, कुंभकरण, मेघनाद के पुतलों को आकार देने का काम कारीगर तेजी से कर रहे हैं। कई रामलीलाओं में कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन भी हो चुका है। बाजार में पांच सौ रुपये से लेकर पांच हजार तक के पुतलों को आकार दिया गया है। कानपुर, प्रयागराज, लखनऊ, कन्नौज, इटावा, उन्नाव समेत कई शहरों में दूसरे प्रांतों से आए कारीगर सड़कों के किनारे पुतले बनाकर बेच रहे हैं तो रामलीलाओं में भी पुतलों को आकार दिया जा रहा है। बांस और कागज से बने ये पुतले जलने के साथ ही यह संदेश देते हैं कि बुराई के मार्ग पर चलने के बजाय सत्य के मार्ग पर चलें अन्यथा अंत बुरा होगा।
सबसे पहले रांची में रावण के पुतले का दहन
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ऐसा माना जाता है कि रावण के पुतले का दहन सबसे पहले रांची शहर में हुआ था जोकि पहले बिहार का हिस्सा था और अब झारखंड राज्य की राजधानी है। यहां 1948 में रावण के पुतले का दहन किया गया था। बंटवारे के बाद साल 1948 में पाकिस्तान से भारत आए कुछ शरणार्थी परिवारों ने रावण के पुतले का दहन करने के लिए कार्यक्रम आयोजित किया था। यहां पर शुरुआत में यह कार्यक्रम बहुत छोटे स्तर पर किया गया लेकिन बाद में इसे और ज्यादा भव्य रूप में किया जाने लगा। राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में पुतला दहन कार्यक्रम 17 अक्टूबर 1953 को किया गया था। इस रावण के पुतले को कागज या लकड़ी के बजाय कपड़ों की मदद से तैयार किया गया था।
कानपुर और दशहरा
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कानपुर में रावण का एक ऐसा अनोखा मंदिर मौजूद है जिसके कपाट साल में एक बार खुलते हैं। विजय दशमी के दिन रावण की प्रतिमा का जलाभिषेक, शृंगार और पूजन होता है। साल 1868 में बने इस मंदिर में इस दिन भारी भीड़ होती है। विजय दशमी के दिन रावण के वध और दहन की परंपरा के बीच कानपुर में एक तरफ अलग-अलग स्थानों पर रावण दहन होता है तो शहर के इस प्रसिद्ध रावण के मंदिर में पूजा और शृंगार होता है।
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अंग्रेज लेखक विलियम हावर्ड रसेल ने वर्ष 1858-59 का समय भारत में बिताया था। इस दौरान उन्होंने कानपुर की भी यात्रा की। भारत में अपनी यात्रा के वृतांत पर उन्होंने डायरी तैयार की। वर्ष 1860 में इसको माई डायरी इन इंडिया के नाम से लंदन में रूटलेज, वार्ने एंड रूटलेज ने प्रकाशित किया। इस पुस्तक में लेखक ने कानपुर की रामलीला व रावण के पुतला दहन का भी वर्णन किया है। उस समय होने वाली भीड़, विशालकाय रावण व भव्य सजावट, संगीत आदि का जिक्र है।
विजया दशमी क्या हैं परम्परा-
विजय का सूचक है पान:
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दशहरा के दिन रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन करने के पश्चात पान का बीणा खाना सत्य की जीत की ख़ुशी को व्यक्त करता है। इस दिन हनुमानजी को बूंदी का भोग लगाने बाद उन्हें पान अर्पित करने की परंपरा है।
नीलकंठ के दर्शन :
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मान्यता है कि लंकापति रावण पर विजय पाने की कामना से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने पहले नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए थे। नीलकंठ पक्षी को भगवान शिव का प्रतिनिधि माना गया है। दशहरा के दिन नीलकंठ के दर्शन और भगवान शिव से शुभफल की कामना की जाती है।
शमी वृक्ष का दर्शन और पूजन:
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दशहरा के दिन शमी वृक्ष का दर्शन व पूजन करना शुभ माना जाता है, जिससे शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है। शनि दोष, साढ़े साती और ढैय्या से मुक्ति मिलती है।-वैदिक विभूषण ज्योतिषाचार्य पं. मनोज कुमार द्विवेदी
