संस्मरण: प्राचार्य जी के शब्द

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Published By Anjali Singh
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बात उन दिनों की है जब मैं कक्षा-10 का विद्यार्थी था। डॉ. बीएन शर्मा जो कि सेना से सेवानिवृत्त थे और हमारे प्राचार्य थे। उनकी छवि एक अनुशासनप्रिय और कड़क प्राचार्य की थी। जब वह अपने हाथ में रूल लेकर पूरे कॉलेज के राउंड पर होते, तो कैंपस में पिन ड्रॉप साइलेंस छा जाता। बच्चे तो बच्चे, आसपास के पेड़ों पर बैठी चिड़ियां भी चहचहाना बंदकर खामोश हो जातीं। मेधावी छात्रों से प्राचार्य जी को सहज लगाव था, जो भी बच्चा उन्हें मन लगाकर पढ़ने वाला और कुशाग्र बुद्धि दिख जाता, वह उनका लाडला हो जाता। 

फिर वह हर तरह से उसके बौद्धिक और मानसिक विकास का न केवल प्रयास करते, वरन उसे विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रेरित भी करते। उनका ऐसा ही एक लाड़ला विद्यार्थी मैं भी था। लेखन में मुझ पर शुरुआत से ही मां सरस्वती की बड़ी कृपा रही थी, किंतु मेरा स्वभाव उस समय तक बड़ा अंतर्मुखी था। सार्वजनिक मंच से बोलने में मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी। कितनी भी अच्छी तैयारी क्यों न की हो, लोगों की अपनी ओर केन्द्रित निगाहें मुझे असहज कर देती थीं। मुझे लगता है शुरुआत में ऐसा सभी के साथ होता है। उस समय खाड़ी युद्ध चल रहा था। 

प्राचार्य जी ने इसी विषय पर एक जिला स्तरीय वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन कराने का निर्णय लिया। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हें इस प्रतियोगिता में कॉलेज का प्रतिनिधित्व करना है। मैंने कहा-“सर! मैं भाषण और वाद-विवाद आदि में उतना अच्छा नहीं हूं।” उन्होंने एक न सुनी और तैयारी करने को कहा। मैंने भी हिम्मत करके विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का अनुशीलन कर मैटर कलेक्ट किया, उसे अपने शब्दों में बिंदुवार लिखा और प्राचार्य जी को दिखाया। पढ़कर वह बेहद खुश हुए और आशा जताई कि प्रथम पुरस्कार विजेता मैं ही होऊंगा। 

मैंने भी प्रतियोगिता से पहले रोज उस मैटर को कई बार दिमाग में बैठाते हुए दोहराया। प्रतियोगिता का दिन आया। जनपद के लगभग सभी विद्यालयों के प्रतिभागी आए हुए थे। बढ़िया स्टेज सजाया गया था। सभी में अत्यंत उत्साह था। मैं थोड़ा नर्वस था, किंतु उत्साहित था। सभी प्रतिभागी पूरे जोशोखरोश के साथ अपनी प्रस्तुति दे रहे थे। सात-आठ प्रतिभागियों के बाद मेरा नाम पुकारा गया। मैं मां सरस्वती का स्मरण करते हुए स्टेज पर पहुंचा। मैंने मां सरस्वती को प्रणाम करते हुए कार्यक्रम के अध्यक्ष, मुख्य अतिथि आदि को अभिवादन करते हुए बोलना शुरू किया। 

जैसे ही मेरी नजर सामने बैठे हुए श्रोताओं पर गई, मैं असहज महसूस करने लगा और मेरे मुंह से आवाज निकलनी बंद हो गई। ऐसा लग रहा था जैसे मुझे कुछ भी याद न रहा हो। प्राचार्य जी मेरा उत्साह बढ़ाते हुए बोले-“बहुत अच्छी शुरुआत है बेटा! आगे जारी रखो।” पर मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। मैं रुआंसा सा हो गया। रुंधे गले से सॉरी कहकर मैं स्टेज से नीचे उतर आया। प्राचार्य जी ने स्टेज पर माइक से कहा-“हमारे विद्यालय का सबसे मेधावी छात्र है, बहुत अच्छा लिखता है। भाषण की कला का वरदान मां सरस्वती सभी को नहीं देतीं।” उनके ये शब्द मेरे बालमन में तीर की तरह जा लगे थे। घर आकर मैं बहुत रोया। 

अपनी पराजय का एहसास मुझे बार-बार हो रहा था और प्राचार्य जी के शब्द मेरे कानों में बार-बार गूंज रहे थे। मैं समझ रहा था कि उन्हें भी मेरे स्टेज पर न बोल पाने से बेहद तकलीफ हुई होगी। उसी वेदना में ये शब्द उनके श्रीमुख से निकले थे। अगले दिन विद्यालय में मैं उनके कक्ष में जाकर उनसे मिला और क्षमा मांगी। उन्होंने कहा-“गौरव! दुःख इस बात का है कि तुमने इतनी अच्छी तैयारी की थी, किंतु आत्मविश्वास के अभाव में तुम घबरा गए। अरे! जब कभी भी भीड़ के सामने बोलो, कभी यह मत सोचो कि सामने सब विद्वान बैठे हैं। 

हमेशा यह सोचो कि सामने वाले को कुछ नहीं पता और तुम इस विषय को सबसे अच्छी तरह जानते हो। कभी घबराहट नहीं होगी।” उनके वे शब्द उसी समय मैंने गांठ बांध लिए। मैंने उसी समय संकल्प लिया कि भाषण कला में अभ्यास करते हुए पारंगत होना है। उसके बाद मैंने कभी भी सार्वजनिक मंच से बोलने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा। धीरे-धीरे स्टेज फियर बिल्कुल गायब हो गया। प्राचार्य जी के शब्द मेरे लिए वरदान सिद्ध हुए और उनका सुझाव मेरे जीवन का मागदर्शक सिद्धांत।-गौरव वाजपेयी ‘स्वप्निल’, साहित्यकार

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