हाईकोर्ट : वर्ष 2017 से पहले नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध दुष्कर्म नहीं

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 18 वर्षों से लंबित वैवाहिक दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने 15 वर्ष से अधिक आयु की नाबालिग पत्नी के साथ शादी के बाद शारीरिक संबंध बनाए हों, तो उसे सिर्फ 2017 के सुप्रीम कोर्ट के ‘इंडिपेंडेंट थॉट’ फैसले के बाद ही अपराध माना जा सकता है, उससे पहले नहीं। वर्ष 2017 के इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 375 (बलात्कार) के अपवाद 2 को संशोधित करते हुए निर्धारित किया कि पत्नी की आयु 18 वर्ष या अधिक होनी चाहिए, तभी वैवाहिक संबंध वैध माने जाएंगे।

जबकि पहले की कानून व्यवस्था के अनुसार 15 वर्ष से अधिक आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाता था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यह संशोधन भविष्य में लागू होगा, पुराने मामलों पर नहीं। इस आधार पर कोर्ट ने माना कि 2005 की घटना पर इसे लागू नहीं किया जा सकता है। अतः वर्तमान मामले में वर्ष 2007 में पारित दोषसिद्धि आदेश को रद्द कर दिया गया। मामले के अनुसार अपीलकर्ता सूचनाकर्ता की 16 वर्षीय बेटी को बहला-फुसलाकर ले गया और शादी कर शारीरिक संबंध बनाए। निचली अदालत ने माना था कि दोनों ने निकाह किया और एक महीने तक पति-पत्नी की तरह रहे, फिर भी लड़की के नाबालिग होने के आधार पर आईपीसी की धारा 363, 366 और 376 के तहत सजा दी गई। 

इस्लाम उर्फ पलटू की अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अनिल कुमार-दशम की एकलपीठ ने पाया कि माता-पिता की गवाही या अन्य साक्ष्यों से यह सिद्ध नहीं होता कि अपीलकर्ता ने लड़की को बहकाया या जबरन ले गया। लड़की ने स्वयं कहा कि युवक के साथ वह स्वेच्छा से गई और कहीं भी धोखे या हेरफेर का संकेत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि केवल घूमने के लिए कहना "फुसलाना" नहीं कहलाता। अभियोजन पक्ष धारा 363 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए अभियुक्त की सक्रिय भूमिका या ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, इसलिए धारा 363 और 366 के तहत अपराध नहीं बनता।

कोर्ट ने कहा कि चूंकि लड़की स्वेच्छा से गई और शारीरिक संबंध विवाह के बाद बने, इसलिए इसे अपहरण नहीं कहा जा सकता। नाबालिग पत्नी से संबंध और बाल विवाह के मुद्दे पर न्यायालय ने स्वीकार किया कि मुस्लिम कानून में विवाह की न्यूनतम आयु 15 वर्ष है जबकि बाल विवाह निषेध अधिनियम में 18 वर्ष। प्रश्न यह था कि कौन सा कानून प्रभावी होगा। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इंडिपेंडेंट थॉट फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आईपीसी और पॉक्सो में बलात्कार की परिभाषा लगभग समान है, पॉक्सो अधिक व्यापक है और धारा 42-ए के अनुसार पॉक्सो अन्य कानूनों (आईपीसी सहित) को असंगति की सीमा तक निरस्त करता है, साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार संशोधन केवल भविष्य में लागू होगा, न कि पूर्वव्यापी प्रभाव से।अंत में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून को पीछे ले जाकर लागू नहीं किया जा सकता और निचली अदालत द्वारा केवल नाबालिग होने के आधार पर दोषसिद्धि देना न्यायसंगत नहीं था। इसी आधार पर 2007 का दोषसिद्धि आदेश रद्द कर अपीलकर्ता को बरी कर दिया गया।

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