रंगमच का शाश्वत उद्देश्य, मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना
“लोके उपभोग्यं नाट्यं भवतु।” अर्थात् नाटक संसार के लिए आनंद का साधन बने। संसार के किसी भी हिस्से में, किसी भी काल में जब नाट्यविधा का आरंभ हुआ होगा, तो उसका मूल उद्देश्य क्या रहा होगा? क्या नाटक का मूल उद्देश्य केवल संदेश देना रहा होगा या किसी विचारधारा को प्रस्तुत करना? रंगमंच का मूल तो अपने दर्शक की आत्मा से जुड़कर रसों की निष्पत्ति करना है, उसके भीतर के वे सारे भाव, जो समाज द्वारा प्रदूषित कर दिए गए हैं, उनकी शुद्धि करना है। - लव तोमर
हाल के वर्षों में नाटक लोगों की राजनीतिक पसंद-नापसंद और उनके निजी एजेंडों पर अधिक निर्भर हो गया है। यह पूरे देश के नाटकों में अनुभव किया जा सकता है। चिंता की बात यह है कि दर्शकों की घटती संख्या पर न तो कोई ध्यान दे रहा है, न ही उसके समाधान पर विचार कर रहा है। नाटक का मूल उद्देश्य केवल राजनीतिक टिप्पणी या सामाजिक संदेश देना मात्र नहीं है। यदि यह साथ में हो पाए तो बहुत अच्छा, लेकिन मूल तो अपने दर्शक के भीतर छिपे भावों को उत्पन्न करना और उसकी आत्मा को स्पर्श करना है।
भारतमुनि का कहना है, “नाट्यं भिन्नरूपं लोकवृत्तानुकीर्तनम्।”अर्थात नाटक मनुष्य के जीवन का अनुकरण है। वहीं अरस्तू का कहना है, नाटक किसी क्रिया का अनुकरण है, जिसका उद्देश्य करुणा और भय के माध्यम से आत्मशुद्धि करना है। दो महान व्यक्ति, जो समय और संस्कृति में पूरी तरह अलग हैं, दोनों एक ही बात कह रहे हैं, “पहले भाव को छुओ, विचार अपने आप जन्म लेंगे।” किंतु आजकल नाटकों में हम देखते हैं कि अभिनेता अपने नाटक के लेखक या निर्देशक के निजी विचारों, उनकी राजनीतिक पसंद-नापसंद को अलग-अलग तरीकों से अभिव्यक्त कर रहे होते हैं। इस प्रकार भाव पर विचार हावी हो जाता है।
कैसे खो रहा है आधुनिक रंगमंच रस
प्रासंगिकता की दौड़ में रंगमंच ने अनुभूति को पीछे छोड़ दिया है। आज अनेक नाटक जीवन को दिखाते नहीं, बल्कि समझाते हैं। वे अनुभव की जगह विचार प्रस्तुत करते हैं।
चार कारण जिनसे रस मिटता है
थीसिस-ड्रामा - जहां नाटक पहले से ही निष्कर्ष लेकर चलता है।
उपदेशात्मक लहजा- जहां पात्र मनुष्य नहीं, प्रवक्ता बन जाते हैं।
विचार-प्रधान लेखन- जहां क्रिया के स्थान पर कथन होता है।
एक-रस शैली- जहां न लय है, न मौन, न विरोधाभास- केवल सूचना।
दर्शक नाटक से जानकर लौटते हैं, जीकर नहीं और बिना अनुभूति का नाटक, नाटक नहीं- प्रचार है। हमें अपनी कहानियों को कहने की कला के अतीत की ओर लौटना होगा। देखना होगा कि किस तरह कालिदास और शेक्सपियर जैसे महान रचनाकारों ने श्रृंगार, करुणा, भय, वीर आदि रसों को साधा या ग्रीक त्रासदियों में कैसे नैतिकता नाटक के अंत में स्वतः प्रकट हो जाती है। या फिर आधुनिक नाटककारों- मोहन राकेश, गिरीश कर्नाड और विजय तेंदुलकर ने अपने पात्रों के जटिल जीवन के माध्यम से भाव उत्पन्न किए, जिन्हें दर्शक अनुभव करता है। यदि कोई संदेश होता है, तो वह स्वतः प्रकट हो जाता है।
संदेश को रस के माध्यम से आना चाहिए, न कि रस के स्थान पर। थिएटर का उद्देश्य सही या गलत का निष्कर्ष निकालना नहीं, बल्कि भाव उत्पन्न करना है। भाव के उत्पन्न होने पर दर्शक स्वयं अपने नैतिक निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होगा। रंगमच का शाश्वत उद्देश्य है, मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना। साझा अनुभव, साझा सांस और साझा हृदय।
