रॉल्स-रॉयस शाही रुतबे का ख्वाब
दुनिया में जब भी बात लग्जरी कारों की होती है, तो एक अकेला नाम एक सदी से भी ज्यादा समय से लगातार अपना रुतबा बनाए नजर आता है – रॉल्स रॉयस। साल 1904 में अपनी स्थापना के बाद से यह ब्रिटिश लग्जरी कार निर्माता वैभव, शिल्प कौशल और परिष्कार का पर्याय रहा है। दरअसल रॉल्स-रॉयस सिर्फ एक कार नहीं, बल्कि शाही रुतबे की निशानी है। भारत में जब पहली रॉल्स रॉयस आई थी, तब इसे सड़क पर देखना वैसा ही था, जैसे आज किसी को निजी जेट से उतरते हुए देखना। इसके “स्पिरिट ऑफ एक्स्टेसी” चिन्ह का मतलब है, शाही आत्मा का उड़ता हुआ गर्व। यह कार सड़कों पर चलती नहीं, बल्कि रौब से गुजरती है। इसका रॉल्स-रॉयस फैंटम मॉडल दुनिया की सबसे ज्यादा मांग वाली लक्जरी कारों में से एक है। दुनिया की सबसे लग्जरी कार ब्रांड रॉल्स-रॉयस ने अपने आइकॉनिक मॉडल फैंटम के 100 साल पूरे होने पर एक खास तोहफा पेश किया है- “फैंटम सेंचुरी प्राइवेट कलेक्शन”। यह लिमिटेड एडिशन सीरीज केवल 25 यूनिट्स में बनाई गई है, जो कला, तकनीक और विरासत का शानदार संगम है। रॉल्स-रॉयस के सीईओ क्रिस ब्राउनरिज ने कहा- यह कार फैंटम की 100 साल की कहानी को एक जीवित कलाकृति की तरह बयान करती है।- प्रस्तुति - मनोज त्रिपाठी
चलता-फिरता म्यूजियम
14.jpg)
कार का इंटीरियर रॉल्स-रॉयस की 100 साल की कहानी कहता है। रियर सीट्स में 1926 की Phantom of Love से प्रेरित टेक्सटाइल्स हैं, जिनमें 1.6 लाख से अधिक बारीक टांके लगे हैं। डैशबोर्ड में Anthology Gallery नाम की खास सजावट है, जिसमें 50 एल्युमिनियम प्लेट्स पर फैंटम के गौरवशाली इतिहास के पलों को उकेरा गया है। दरवाजों की वुडवर्क में 24-कैरेट गोल्ड लीफ से बने रास्ते और पुराने फैंटम ट्रिप्स की कहानियां दर्शाई गई हैं।
डिजाइन में झलका शाही अंदाज
15.jpg)
इस एक्सक्लूसिव मॉडल को तैयार करने में कंपनी ने तीन साल और 40,000 घंटे से ज्यादा का समय लगाया है। इसका एक्सटीरियर Super Champagne Crystal और Arctic White-Black टू-टोन पेंट में सजा है, जिसमें असली गोल्ड ग्लास पार्टिकल्स मिलाए गए हैं ताकि कार की चमक अनोखी दिखे। इसके ग्रिल पर लगी Spirit of Ecstasy मूर्ति को 18-कैरेट सोने में ढाला गया है और उस पर फैंटम सेंचुरी का खास निशान उकेरा गया है।
भारत में रॉल्स रॉयस की एंट्री
भारत में इस कार की एंट्री ब्रिटिश राज के समय हुई। सबसे पहले इसे महाराजा ऑफ अलवर, पटियाला, जयपुर और मैसूर ने खरीदा। उनके गैरेज में एक या दो नहीं, छह से लेकर बीस तक रॉल्स रॉयस कारें हुआ करती थीं। इनके बाद कई और महाराजाओं की रॉल्स-रॉयस के प्रति दीवानगी देखने में आई।
छत पर तारों से सजा इतिहास
कार की Starlight Headliner में 4.4 लाख सितारों जैसी सिलाई है, जो फैंटम की यात्रा को आसमान पर दर्शाती है। इसके इंजन हुड के नीचे वही पावरफुल 6.75-लीटर V12 इंजन है, लेकिन इस बार 24-कैरेट गोल्ड ट्रिम के साथ मानो शताब्दी को सुनहरे अंदाज में सलाम कर रहा हो। फैंटम सेंचुरी कलेक्शन सिर्फ एक कार नहीं, बल्कि 100 साल की लग्जरी, कला और इंजीनियरिंग का प्रतीक है। रॉल्स-रॉयस ने फिर साबित किया है कि लक्जरी सिर्फ बनाई नहीं जाती, गढ़ी जाती है।
कला और इंजीनियरिंग का संगम
सेंचुरी की हस्तकला एक कहानी की तरह प्रवाहित होती है। लकड़ी की नक्काशीदार सतहें सहज रूप से कढ़ाईदार चमड़े के पैनलों में परिवर्तित हो जाती हैं। 24 कैरेट सोने की झलकियां सुनहरे धागों की कढ़ाई में रूपांतरित होती हैं, जो नक्शों, भू-दृश्यों और यात्रा-मार्गों को सूक्ष्मता से प्रस्तुत करती हैं।
कीमत और क्लास
रॉल्स-रॉयस की शुरुआत भारत में करीब 9 करोड़ रुपये से होती है और कस्टमाइजेशन के साथ यह 15 से 20 करोड़ रुपये तक जा सकती है। हर रॉल्स-रॉयस कार हाथ से तैयार की जाती है। सीटों का लेदर, लकड़ी की फिनिशिंग और इंजन की साइलेंसिंग सब कस्टम डिजाइन पर निर्भर करता है। कोई दो रॉल्स-रॉयस एक जैसी नहीं होती हैं।
रॉल्स-रॉयस स्पेक्टर: यह कंपनी की पहली पूरी तरह से इलेक्ट्रिक कार है। इसमें दमदार इलेक्ट्रिक मोटर, शानदार इंटीरियर और एक बेहतरीन ड्राइविंग रेंज मिलती है।
रॉल्स-रॉयस बो टेल: यह दुनिया की सबसे महंगी कारों में से एक है, जिसकी कीमत 239 करोड़ रुपये से ज्यादा है। यह क्लासिक यॉट (नाव) डिजाइन से प्रेरित है और एक कस्टमाइज्ड, लिमिटेड एडिशन मॉडल है।
आज भी आसान नहीं खरीदना
रॉल्स-रॉयस आज भी खरीदना आसान नहीं है। इसकी वजह न सिर्फ इसकी कीमत, बल्कि कंपनी की सेलेक्टिव अप्रोच है। यह कार सिर्फ पैसे से नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा से भी खरीदी जाती है। कंपनी अपने संभावित ग्राहकों का प्रोफाइल चेक करती है, फिर ऑर्डर स्वीकार करती है।
देश में कौन रखता है यह कार
मुकेश अंबानी: Rolls Royce Cullinan और Phantom सीरीज के मालिक हैं। विजय माल्या ने कई विंटेज और आधुनिक रॉल्स-रॉयस कारें खरीदी थीं। अमिताभ बच्चन को Rolls Royce Phantom फिल्म निर्माता विधु विनोद चोपड़ा सेगिफ्ट में मिली थी। प्रियंका चोपड़ा, रणवीर सिंह, बादशाह जैसे स्टार्स के गैरेज में भी रॉल्स-रॉयस के मॉडल्स शोभा बढ़ाते रहे हैं।
अलवर महाराजा और रॉल्स-रॉयस की कहानी
15.jpg)
यह कहानी 1920 के दशक की है, जब अलवर के महाराजा जय सिंह प्रभाकर ने लंदन की यात्रा के दौरान सादे कपड़ों में रॉल्स-रॉयस के शोरूम में पहुंच गए। उन्हें साधारण व्यक्ति समझकर शोरूम के सेल्समैन ने उनका अपमान करते हुए बाहर का रास्ता दिखा दिया। महाराजा को उनके पहनावे की वजह से अनदेखा किया गया और यह माना गया था कि वे इतनी महंगी कार नहीं खरीद सकते हैं। इस अपमान का बदला लेने के लिए दो दिन बाद महाराजा अपने शाही लिबास में दल-बल के साथ शोरूम पहुंचे।
इस बार शोरूम के कर्मचारियों ने उनका जोरदार स्वागत किया और लाल कालीन बिछाया। महाराजा ने शोरूम में रखी सभी रॉल्स-रॉयस कारें खरीद लीं और उन्हें भारत भेजने का आदेश दिया। जब ये कारें अलवर पहुंचीं तो महाराजा ने उन्हें नगर पालिका को सौंप दिया और उनका इस्तेमाल शहर का कचरा उठाने के लिए करने का आदेश दिया। दुनियाभर में यह खबर फैल गई और रॉल्स-रॉयस की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचा। रॉल्स-रॉयस की बिक्री तेजी से गिरी और कंपनी को काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी। रॉल्स-रॉयस कंपनी के मालिक ने महाराजा जय सिंह को टेलीग्राम भेजकर माफी मांगी और उन्हें मुफ्त में छह नई कारें देने की पेशकश की। जब महाराजा संतुष्ट हो गए कि कंपनी ने सबक सीख लिया है, तो उन्होंने कारों का इस्तेमाल कचरा उठाने के लिए बंद करवा दिया।
