जंगली हाथियों की घटती आबादी पर हो विमर्श

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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हाथियों पर डीएनए आधारित जनगणना के नतीजे आ गए हैं। सार्वजनिक हुए नजीते सुखद नहीं, दुखद हैं? भारत के जंगलों से गजराजों की आबादी तेजी से घटी बताई गई है। घटने की तेजी में अगर रफ्तार ऐसी ही रही, तो जंगलों से गजराजों का गर्जना भविष्य में शांत भी हो सकता है। निश्चित रूप से यह रिपोर्ट सोचने पर विवश करती है। ये रिपोर्ट, पर्यावरणविदों की उन बातों पर मुहर लगाती है, जिनमें वह केंद्र और राज्य सरकारों से लंबे समय से हाथियों को बचाने की मांग करते आए हैं। पीलीभीत के जंगल में नेपाल से जंगली हाथियों का आना कम हुआ है, वहीं रामनगर के जंगल में हाथियों की संख्या बढ़ी है। -डॉ. रमेश ठाकुर

भारत में पहली मर्तबा डीएनए आधारित इस नई टेक्नोलॉजी द्वारा हाथियों की गिनती हईं हैं, जिसमें यह चिंतनीय रिपोर्ट सामने निकलकर आई है। नई डीएनए तकनीक प्रत्येक हाथी की उसके जेनेटिक सिग्नेचर से पहचान करती है। इससे गिनती बिल्कुल सटीक बाहर निकलती है। इसे दुनिया की पहली व्यापक डीएनए-आधारित हाथी गणना का तगमा हासिल है। रिपोर्ट ने सबसे ज्यादा हाथी कर्नाटक में बताए हैं, वहां 6,013 हाथी हैं। दूसरे स्थान पर असम को रखा है, जहां 4,159 हाथी है। इसके अलावा तमिलनाडु में 3,136, केरल में 2,785, उत्तराखंड में 1,792 और ओडिशा में 912 हाथी शेष बचे हैं। उत्तराखंड, तराई क्षेत्र, हिमाचल क्षेत्रों के हालात बहुत खराब दर्शाते हैं, जो संख्या जांची गई है, उसमें हाथियों की कोई प्रजाति ऐसी नहीं बची, जिनमें घटौती न दर्ज की गई हो। मौजूदा गणना की मानें तो पिछले 8 सालों में करीब 25 फीसदी हाथियों की संख्या भारत में सिमट गई है। 

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने हाथियों को लेकर पिछली गणना साल-2017 में कराई गई थी, जिसमें 29964 हाथी बताए गए थे। वहीं, मौजूदा गणना में संख्या घटकर मात्र 22446 रह गई। यानी वर्ष 2017 से 2025 के बीच इन 8 वर्षों में करीब साढ़े सात हजार हाथी कम हो गए। हाथियों की कम होती आबादी जंगलों के सिकुड़ते आकार और इंसानों व हाथियों के बीच बढ़ते टकराव की ओर इशारा आज से नहीं, बल्कि बहुत पहले से कर रही है, लेकिन हम बेखबर थे। 

असम के जंगलों में हाथियों की संख्या सर्वाधिक हुआ करती थी। वहां उनका अवैध शिकार बड़े स्तर पर आज भी जारी है। हाथियों की कुछ प्रजातियां ऐसी हैं, जो सिर्फ भारत में ही पाई जाती हैं। उन हाथियों के दांत व अन्य शरीर के अंग अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारी डिमांड रहती है। मोटी कमाई के लालच में तस्कर बेजुबान हाथियां का शिकार करते हैं। इस कृत्य में कई मर्तबा फॉरेस्ट कर्मचारियों की भी मिलीभगत सामने आती आई है।

 अभी कुछ नहीं बिगड़ा, हाथियों को अभी भी बचाया जा सकता है। क्योंकि विश्व के 90 देशों के मुकाबले भारत में गजराजों की आबादी अभी भी सर्वाधिक है। भारत के पश्चिमी घाट अभी भी हाथियों के सबसे बड़े गढ़ हैं, वहां 11,934 हाथी हैं, जबकि 2017 में संख्या 14,587 थी। उत्तर-पूर्वी पहाड़ियों और ब्रह्मपुत्र के बाढ़ वाले मैदानों में 6,559 हाथी हैं, जो 2017 के 10,139 से कम हैं। मध्य भारत के ऊंचे इलाके और पूर्वी घाट में कुल मिलाकर 1,891 हाथी हैं, जो 2017 की रिपोर्ट में बताए गए 3,128 हाथियों से कम हैं। 

आबादी बढ़ाने के लिए सबसे पहले सुरक्षित आवासों को संरक्षित करना होगा और अवैध शिकार करने वाले तस्करों पर लगाम लगानी होगी। साथ ही सबसे जरूरी ध्यान मादा हथनियों के स्वास्थ्य देखभाल और उनके आवश्यक रखरखाव पर ध्यानकार्षण करना होगा। इससे प्रजनन क्रियाओं को बढ़ावा मिलेगा। असम, कर्नाटक जैसे राज्यों को ‘टाइगर रिर्जव’ की भांति ‘हाथी रिजर्व परियोजना’ या ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ जैसे विंग गठित होने चाहिए। इन जरूरी तथ्यों पर ध्यान दिए बिना हाथी को नहीं बचाया जा सकता। इसमें सामाजिक स्तर पर प्रत्येक इंसान को भी अपनी भागीदारी निभानी होगी, क्योंकि बिना जनमानस के सहयोग से कोई भी सरकारी योजना सफल नहीं होती।