जिस रूप में चाहेंगे, यहां मिलेंगे राम
अयोध्या की धरती ऐसी है, जहां आप जिस रूप में चाहेंगे राम मिलेंगे। श्रीराम एक हैं, लेकिन रंग में काले, सांवले और गोरे राम भी मिलेंगे। राम की आराधना की परंपरा भी यहां अनेक है। एक सामान्य मानव से जुड़े, जितने रिश्ते होते हैं। अपनी जन्मभूमि में वह उन सभी मानवीय रिश्तों का निर्वाह करते महसूस किए जा सकते हैं। उसी भाव से उनकी आराधना कर भक्त अपना अभीष्ट भी प्राप्त कर लेते हैं। लंबे संघर्ष के बाद श्रीराम की जन्मभूमि का स्थान नियत हुआ। यहां निर्माणाधीन मंदिर में बाल रूप रामलला प्रतिष्ठित हुए। दर्शन के लिए देश से विदेश तक के श्रद्धालु उमड़े। राम मंदिर में सांवले राम हैं। यह तो अयोध्या की पहचान है। - राजेंद्र कुमार पांडेय, अयोध्या।
राम की पूजा पूरे विश्व में होती है। वह सर्वव्यापी है, लेकिन परंपरा की दृष्टि से अयोध्या कुछ अलग है। भक्त, भगवान के वश में होते हैं। यह भी यहां चरितार्थ होता है। सद्गुरु सदन में गुरु का चित्र श्रीराम के विग्रह के ऊपर रखकर अर्चन किया जाता है। यहां राम की पूजा शिष्य भाव से की जाती है। अयोध्या में वह सभी मानवीय रिश्तों में हर समय मौजूद रहते हैं। रिश्तों को आधार मानकर की गई आराधना को स्वीकार करते हैं। बिअहुति भवन, लक्ष्मण किला जैसे मंदिर में दूल्हे के रूप में उनकी आराधना की जाती है। सियाराम किला मंदिर में राम सखाभाव से पूजे जाते हैं। यहां संत माता सीता को अपनी सखी मानते हैं। वह महिला का श्रृंगार करते हैं। राम की जीजा के रूप में आराधना करते हैं। इन मंदिरों से सिद्ध साधको की लंबी जमात रही है। कनक भवन जैसे मंदिर में बाल और युगल सरकार के रूप में पूजा होती है।
काले, गोरे और सांवले राम
परंपरा की दृष्टि से अयोध्या छोटा विश्व है। यहां महाराष्ट्रीयन पद्धति का कालेराम मंदिर है, जहां राम का विग्रह काले रंग का है। सरयू तट के करीब गोरे राम का मंदिर भी है, जहां राम की मूर्ति गोरे रंग की है। निर्माणाधीन राम मंदिर में सांवले राम के साथ अब ऊपरी मंजिल पर राजा राम का दरबार सज गया है। अयोध्या के ऐसे बहुत से मंदिर हैं, जहां राजा राम के दरबार की स्थापना है।
सरयू के साथ राम की पहचान
नेत्रजा, वाशिष्ठी जैसे नामों से पुकारी जाने वाली पावन सलिला माता सरयू की पहचान राम के साथ है। भक्त और श्रद्धालु मानते हैं कि बालक के रूप में राम सरयू के तट पर खेले, स्नान किया। कहते हैं भगवान राम, सरयू को मां की तरह मानते थे। इसलिए अयोध्या आने के बाद सरयू का स्नान, दर्शन, पूजन संत और श्रद्धालु पहले करते हैं।
500 साल बाद अयोध्या
यूं तो अयोध्या को पहचान की न कभी जरूरत थी और न होगी। यह सृष्टि की आदि नगरी है, लेकिन लगभग 500 साल के संघर्ष के बाद श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होने के बाद नए परिवेश में अयोध्या को नई पहचान जरूर मिली। इन दिनों राम मंदिर अयोध्या का आकर्षण है, लेकिन इसके साथ अयोध्या की यात्रा करें, तो यहां के अन्य मंदिरों के साथ पौराणिक स्थलों तक पहुंचेंगे तो आनंद कुछ ज्यादा मिलेगा।
