पौराणिक कथा: कृष्ण की गुरु दक्षिणा
कंस वध के बाद जब मथुरा में शांति लौट आई, तब वसुदेव और देवकी ने निश्चय किया कि अब कृष्ण के औपचारिक शिक्षा-दीक्षा का समय आ गया है। इसी उद्देश्य से वे उन्हें अवंतिका नगरी (आज का उज्जैन) स्थित महान ऋ षि सांदीपनि के गुरुकुल में भेजते हैं। वहां कृष्ण और बलराम ने वेद-शास्त्र, राजनीति, युद्धकला और विविध विद्याओं में अल्प समय में अद्भुत प्रगति की।
गुरु सांदीपनि इस दिव्य प्रतिभा को देखकर अत्यंत प्रसन्न थे। शिक्षा पूर्ण होने पर कृष्ण ने विनम्रता से गुरु दक्षिणा की बात की। ऋ षि सांदीपनि ने सहज ही कहा-“वत्स, तुमसे क्या मांगूं? ऐसा कुछ नहीं जो तुम दे न सको।” पर कृष्ण ने आग्रह किया- “गुरुदेव, दक्षिणा के बिना विद्या अपूर्ण रहती है। कृपया कुछ भी बताइए।”
कुछ क्षण मौन रहने के बाद ऋ षि सांदीपनि ने कहा-“शंखासुर नाम का एक दैत्य मेरे पुत्र को उठा ले गया था। यदि तुम मेरी दक्षिणा देना चाहते हो, तो मेरे पुत्र को वापस ले आओ।” कृष्ण ने तुरंत इसे स्वीकार किया और बलराम के साथ खोज यात्रा पर निकल पड़े।
दोनों भाई सागर तट तक पहुंचे। समुद्र से पूछने पर उसने बताया कि पंचज जाति का शंखासुर, शंख का रूप धारण कर समुद्र की गहराइयों में छिपा है। संभवतः उसी ने गुरु-पुत्र को ग्रस लिया होगा। कृष्ण समुद्र में उतरे और भयंकर युद्ध के बाद शंखासुर का वध कर दिया। उसके पेट में उन्होंने गुरु-पुत्र की खोज की, परंतु वह वहां नहीं मिला। कृष्ण खोजते हुए यमलोक पहुंचे। यमराज ने भगवान की प्रार्थना स्वीकार की और सांदीपनि के पुत्र को जीवित कर कृष्ण को सौंप दिया। कृष्ण उसे लेकर गुरु के पास लौटे।
गुरुकुल में अपने पुत्र को देखकर ऋ षि सांदीपनि भाव-विभोर हो उठे। उन्होंने कृष्ण की भक्ति और दायित्वबोध की महिमा का गुणगान किया और यही माना कि इससे बढ़कर गुरु-दक्षिणा कोई हो ही नहीं सकती। इस प्रकार कृष्ण ने न सिर्फ अपने गुरु का ऋण चुकाया, बल्कि यह बताया कि विद्या तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक उसमें गुरु-सेवा, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा का तत्व न हो।
