राम नगरी अयोध्या अलौकिक से अद्भुत हुई 

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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500 वर्ष के लंबे संघर्ष और इंतजार के बाद 25 नवंबर को वो शुभ घड़ी आ गई, जब देश-दुनिया के आस्था के केंद्र प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या में भव्य राममंदिर पूर्ण हो जाएगा। बाबर की शह पर 1528 में रामनगरी में जिस मंदिर को तोड़ दिया गया था, वहां भव्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निमार्ण की 5 सदी से चली आ रही प्रतीक्षा समाप्त होने का ऐतिहासिक पल आ गया है। 25 नवंबर मंगलवार को शुभ मुहूर्त दोपहर 12 से 12: 30 बजे के बीचर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदिर के 191 फिट ऊंचे शिखर पर सूर्य के मध्य अंकित ‘ऊं’ व कोविदार वृक्ष का केसरिया ध्वज चढ़ाएंगे और श्रीराममंदिर निर्माण कार्य पूरा होने की घोषणा करेंगे। 

09 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच द्वारा श्रीराम जन्मभूमि के पक्ष में फैसला सुनाने के बाद 25 मार्च 2020 को पूरे 28 साल बाद रामलला टेंट से निकलकर फाइबर मंदिर में शिफ्ट हुए थे। इसके बाद 05 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामजन्मभूमि परिसर में भूमि पूजन कर श्रीराम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखी। इसके बाद 22 जनवरी 2024 को रामलला की मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई।  आज करोड़ों लोग भगवान राम के दर्शन के लिए अयोध्या आ रहे हैं। हालांकि, आज जो भगवान के दर्शन हो रहे हैं, उसके पीछे दशकों तक चली लंबी कानूनी लड़ाई है। राम मंदिर निर्माण का सफर काफी चुनौतियों भरा रहा है। बाबरी विवाद, अदालतों में चली लंबी लड़ाई और फिर शीर्ष अदालत के फैसले के बाद मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। नौ नवंबर, 2019 को तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई, पूर्व सीजेआई एसए बोबडे, वर्तमान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और पूर्व न्यायाधीश अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पांच सदस्यीय बेंच ने राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में फैसला सुनाया था।-विवेक सक्सेना

अब तक के इतिहास के अहम पड़ाव

1528: अयोध्या में राम जन्मभमूमि पर मस्जिद बनने से शुरु हुआ विवाद

मुगल शासक बाबर के सूबेदार मीरबाकी ने 1528 में अयोध्या में एक मस्जिद बनवाई। यह मस्जिद उसी जगह बनी जहां भगवान राम का जन्म हुआ था। बाबर के सम्मान में मीर बाकी ने इस मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद रखा। 19वीं सदी में हिंदुओं ने यह मामला उठाया और कहा कि भगवान राम के जन्मस्थान मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना ली गई। इसके बाद से रामलला के जन्मस्थल को वापस पाने की लड़ाई शुरू हुई। 

•    1858: बाबरी मस्जिद बनने के 330 साल बाद हुई पहली एफआईआर 

मीरबाकी के मस्जिद बनाने के 330 साल बाद 1858 में लड़ाई कानूनी हो गई, जब पहली बार परिसर में हवन, पूजन करने पर एक एफआईआर हुई। अयोध्या रिविजिटेड किताब के मुताबिक एक दिसंबर 1858 को अवध के थानेदार शीतल दुबे ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि परिसर में चबूतरा बना है। ये पहला कानूनी दस्तावेज है, जिसमें परिसर के अंदर राम के प्रतीक होने के प्रमाण हैं। इसके बाद तारों की एक बाड़ खड़ी कर विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिंदुओं को अलग-अलग पूजा और नमाज की इजाजत दी गई।

•    1885: जब अदालत पहुंची राम के लिए पक्के घर की बात

1858 में हुई लड़ाई के 27 साल बाद 1885 में राम जन्मभूमि के लिए लड़ाई अदालत पहुंची। जब, निर्मोही अखाड़े के मंहत रघुबर दास ने फैजाबाद के न्यायालय में स्वामित्व को लेकर दीवानी मुकदमा दायर किया। दास ने बाबरी ढांचे के बाहरी आंगन में स्थित राम चबूतरे पर बने अस्थायी मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने की मांग की। जज ने फैसला सुनाया कि वहां हिंदुओं को पूजा-अर्चना का अधिकार है, लेकिन वे जिलाधिकारी के फैसले के खिलाफ मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने की अनुमति नहीं दे सकते।

 •    1949: मूर्तियों का प्रकटीकरण

देश के आजाद होने के दो साल बाद 22 दिसंबर 1949 को ढांचे के भीतर गुंबद के नीचे रामलला की मूर्तियों का प्रकटीकरण हुआ। हिंदू पक्ष का कहना था कि राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुस्लिमों ने आरोप लगाया था कि किसी ने रातों-रात मूर्तियां रख दीं। इसके बाद इसे विवादित ढांचा मानकर ताला लगवा दिया गया था

•    1950: आजादी के बाद पहला मुकदमा

आजादी के बाद पहला मुकदमा हिंदू महासभा के सदस्य गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी, 1950 को सिविल जज, फैजाबाद की अदालत में दायर किया। विशारद ने ढांचे के मुख्य गुंबद के नीचे स्थित भगवान की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना की मांग की। करीब 11 महीने बाद 5 दिसंबर 1950 को ऐसी ही मांग करते हुए महंत रामचंद्र परमहंस ने सिविल जज के यहां मुकदमा दाखिल किया। मुकदमे में दूसरे पक्ष को संबंधित स्थल पर पूजा-अर्चना में बाधा डालने से रोकने की मांग रखी गई। 3 मार्च 1951 को गोपाल सिंह विशारद मामले में न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष को पूजा-अर्चना में बाधा न डालने की हिदायत दी। ऐसा ही आदेश परमहंस की तरफ से दायर मुकदमे में भी दिया गया।

•    1959: निर्मोही अखाड़े ने मांगी पूजा-अर्चना की अनुमति 

17 दिसंबर 1959 को रामानंद संप्रदाय की तरफ से निर्मोही अखाड़े के छह व्यक्तियों ने मुकदमा दायर कर इस स्थान पर अपना दावा ठोका। साथ ही मांग रखी कि रिसीवर प्रियदत्त राम को हटाकर उन्हें पूजा-अर्चना की अनुमति दी जाए। यह उनका अधिकार है। मुकदमों की कड़ी में एक और मुकदमा 18 दिसंबर 1961 को दर्ज किया गया। ये मुकदमा उत्तर प्रदेश के केंद्रीय सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दायर किया। कहा कि यह जगह मुसलमानों की है। ढांचे को हिंदुओं से लेकर मुसलमानों को दे दिया जाए। ढांचे के अंदर से मूर्तियां हटा दी जाएं। ये मामले न्यायालय में चलते रहे। 

•    1982: हिंदू धर्मस्थलों की मुक्ति का अभियान

1982 वो साल था जब विश्व हिंदू परिषद ने राम, कृष्ण और शिव के स्थलों पर मस्जिदों के निर्माण को साजिश करार दिया और इनकी मुक्ति के लिए अभियान चलाने का एलान किया। दो साल बाद 8 अप्रैल 1984 को दिल्ली में संत-महात्माओं, हिंदू नेताओं ने अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि स्थल की मुक्ति और ताला खुलवाने को आंदोलन का फैसला किया। 

•    1986: परिसर का ताला खुला

कानूनी लड़ाई में एक फैसला 1 फरवरी 1986 को आया जब फैजाबाद के जिला न्यायाधीश केएम पाण्डेय ने स्थानीय अधिवक्ता उमेश पाण्डेय की अर्जी पर इस स्थल का ताला खोलने का आदेश दे दिया। फैसले के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में दायर अपील खारिज हो गई। 

•    1989: राम जन्मभूमि पर मंदिर का शिलान्यास

जनवरी 1989 में प्रयाग में कुंभ मेले के दौरान मंदिर निर्माण के लिए गांव-गांव शिला पूजन कराने का फैसला हुआ। साथ ही 9 नवंबर 1989 को श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गई। काफी विवाद और खींचतान के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शिलान्यास की इजाजत दे दी। बिहार निवासी कामेश्वर चौपाल से शिलान्यास कराया गया।

•    1990: आडवाणी ने शुरु की रथ यात्रा, आंदोलन को दी धार

सितंबर 1990 को लाल कृष्ण आडवाणी रथ यात्रा लेकर निकले। इस यात्रा ने राम जन्मभूमि आंदोलन को और धार दे दी। आडवाणी गिरफ्तार हुए। गिरफ्तारी के साथ केंद्र में सत्ता परिवर्तन भी हुए। 

•    1992: विवादित ढांचा गिरा, कल्याण सरकार बर्खास्त

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या पहुंचे हजारों कारसेवकों ने विवादित ढांचा गिरा दिया। इसकी जगह इसी दिन शाम को अस्थायी मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। केंद्र की तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने राज्य की कल्याण सिंह सरकार सहित अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों को भी बर्खास्त कर दिया। जन्मभूमि थाना में ढांचा ध्वंस मामले में भाजपा के कई नेताओं समेत हजारों लोगों पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया। 

•    1993: दर्शन-पूजन की अनुमति मिल गई

बाबरी ढहाए जाने के दो दिन बाद 8 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कर्फ्यू लगा था। वकील हरिशंकर जैन ने उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में गुहार लगाई कि भगवान भूखे हैं। राम भोग की अनुमति दी जाए। करीब 25 दिन बाद 1 जनवरी 1993 को न्यायाधीश हरिनाथ तिलहरी ने दर्शन-पूजन की अनुमति दे दी। 7 जनवरी 1993 को केंद्र सरकार ने ढांचे वाले स्थान और कल्याण सिंह सरकार द्वारा न्यास को दी गई भूमि सहित यहां पर कुल 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया। 

•    2002: हाईकोर्ट में शुरू हुई मालिकाना हक पर सुनवाई

अप्रैल 2002 में उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने विवादित स्थल का मालिकाना हक तय करने के लिए सुनवाई शुरू हुई। उच्च न्यायालय ने 5 मार्च 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को संबंधित स्थल पर खुदाई का निर्देश दिया। 22 अगस्त 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने न्यायालय को रिपोर्ट सौंपी। इसमें संबंधित स्थल पर जमीन के नीचे एक विशाल हिंदू धार्मिक ढांचा (मंदिर) होने  की बात कही गई।

•    2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिया ऐतिहासिक फैसला

30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस स्थल को तीनों पक्षों श्रीराम लला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया। न्यायाधीशों ने बीच वाले गुंबद के नीचे जहां मूर्तियां थीं, उसे जन्मस्थान माना। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। 

•    2017: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मध्यस्थता की पेशकश

21 मार्च 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता से मामले सुलझाने की पेशकश की। यह भी कहा कि दोनों पक्ष राजी हों तो वह भी इसके लिए तैयार है। 

•    2019: सुप्रीम फैसला और मंदिर निर्माण का रास्ता साफ 

6 अगस्त 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिदिन सुनवाई शुरू की। 16 अक्तूबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई पूरी हुआ और कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। इससे पहले 40 दिन तक लगातार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।


9 नवंबर 2019 को 134 साल से चली आ रही लड़ाई में सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित स्थल को श्रीराम जन्मभूमि माना और 2.77 एकड़ भूमि रामलला के स्वामित्व की मानी। वहीं, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावों को खारिज कर दिया गया। इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार तीन महीने में ट्रस्ट बनाए और ट्रस्ट निर्मोही अखाड़े के एक प्रतिनिधि को शामिल करे। इसके अलावा यह भी आदेश दिया कि उत्तर प्रदेश की सरकार मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक रूप से मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ भूमि किसी उपयुक्त स्थान पर उपलब्ध कराए।

•    2020: अयोध्या में मंदिर की आधारशिला के साथ निर्माण शुरू

इसी के साथ दशकों से चली आ रही लंबी कानूनी लड़ाई समाप्त हो गई। 5 फरवरी 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की घोषणा की। इसके छह महीने बाद 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री ने अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी।

•    2024: भव्य मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा

134 साल चली कानूनी लड़ाई के बाद राम जन्मभूमि पर मंदिर के पहले चरण का काम पूरा होने के बाद इसमें रामलला को स्थापित किया गया। 22 जनवरी 2024 की वह ऐतिहासिक तारीख थी, जब मंदिर में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा हुई। 23 जनवरी से मंदिर आम लोगों के लिए खुल गया था।
 

सोत्र –गजेटियर, हिन्दू चेतना स्मारिका