हमारी गुलाबी चुनरिया, हमें लागी नजरिया...
भारत की सांस्कृतिक धरोहर उसकी लोकपरंपराओं में निहित है और लोकगीत इन परंपराओं की आत्मा माने जाते हैं। जैसे ब्रज, अवधी, बुंदेलखंड और भोजपुरी की अपनी विशिष्ट लोकधारा है, वैसे ही उत्तर प्रदेश का कन्नौज क्षेत्र भी अपनी विशिष्ट कन्नौजी लोकगीत परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। कन्नौजी बोली क्षेत्र के अंतर्गत 6 जिले फर्रुखाबाद, शाहजहांपुर, हरदोई, कानपुर, इटावा और पीलीभीत आते हैं। कन्नौजी में गाए जाने वाले ये गीत न केवल मनोरंजन के साधन हैं, बल्कि ग्रामीण जीवन, भावनाओं, संस्कारों, रीति-रिवाजों और सामाजिक संबंधों का सजीव दस्तावेज भी हैं।-डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री
कन्नौजी लोकगीतों की उत्पत्ति और विशेषता
कन्नौजी लोकगीतों की जड़ें ग्रामीण समाज की मिट्टी में गहराई तक पैठी हुई हैं। ये गीत किसी एक कवि या लेखक की रचना नहीं, बल्कि जनजीवन के अनुभवों का सामूहिक रूप हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी सुनकर और गाकर इनका रूप विकसित होता रहा है। इन गीतों में न तो व्यावसायिकता है, न कृत्रिमता, ये लोकमन की सहज अभिव्यक्ति हैं। भाषा में मृदु कन्नौजी लहजा, सरलता और हास्य-विनोद का पुट इन्हें विशिष्ट बनाता है। कन्नौजी लोकगीतों की एक विशेषता यह भी है कि ये जीवन के प्रत्येक अवसर से जुड़े होते हैं- जन्म से लेकर मृत्यु तक, हर्ष और विषाद दोनों ही स्थितियों में लोकगीत गाए जाते हैं। मांगलिक अवसरों के गीत कन्नौजी बोली के क्षेत्र में संस्कार गीतों का अपना महत्व है।
प्रमुखता यहां पांच प्रकार के संस्कार गीत प्राप्त होते हैं- जन्म गीत, अन्नप्राशन गीत, मुंडन गीत, यज्ञोपवीत गीत और विवाह गीत। पुत्र जन्म के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों को सोहर कहा जाता है, वहीं मुंडन और अन्नप्राशन संस्कारों के अवसर पर भी सोहर गाने की परंपरा होती है। यज्ञोपवीत के समय गाए जाने वाले गीत बरुआ कहलाते हैं, जबकि विवाह के अवसर पर बना और बन्नी गाने का प्रचलन है। ये मांगलिक गीत अत्यंत लोकप्रिय हैं। ऐसे गीतों में मातृभाव, हंसी-ठिठोली और भावुकता का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
सोहर का एक उदाहरण देखें-
धीरे-धीरे रेडियो बजना मेरे राजा जी / रेडियो की आवाज सुन सासु दौड़ी आवेंगी।/उनको भी हलके से कंगन बनवाना मेरे राजा जी/ पांच के बनवाना पचास के बताना जी/ धीरे-धीरे रेडियो बजना मेरे राजा जी।
एक बन्नी - बन्नी नादान बजावे हरमोनिया/दादी के कमरे बजावे हरमोनिया।/ छेड़ें तान हंसे सारी दुनिया/ बन्नो नादान हंसे सारी दुनिया। महिलाएं समूह में बैठकर इन गीतों को गाती हैं और उनमें स्थानीय शब्दावली, पारिवारिक संबंधों और ग्रामीण जीवन के प्रतीक झलकते हैं।
कृषि और श्रम जीवन से जुड़े गीत
कन्नौजी समाज का जीवन मूलतः कृषि आधारित है, इसलिए खेती-बाड़ी, वर्षा, फसल कटाई, बैल और हल से जुड़े अनेक गीत मिलते हैं। ये गीत खेतों में काम करते समय गाए जाते हैं, जिससे श्रम का बोझ हल्का होता है और सामूहिकता की भावना बढ़ती है।
बरखा आई ओ रे साथी, बइठै न अब घर मा।/ खेतन में पानी भरि आयो, चलो लगावईं धान। ऐसे गीतों में किसान की मेहनत, आशा और प्रकृति के प्रति आदर झलकता है।
त्योहार और धार्मिक लोकगीत
कन्नौजी लोकजीवन में त्योहारों का बड़ा महत्व है। होली, दिवाली, रक्षाबंधन, तीज, करवाचौथ आदि पर्वों पर विशेष लोकगीत गाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त कन्नौजी क्षेत्र के मुख्य व्रत त्योहारों में शीतलाष्टमी, रामनवमी, वटसावित्री व्रत, नागपंचमी, जन्माष्टमी, हल षष्ठी, हरतालिका तीज, गणेश चतुर्थी, अनंत चौदश, लक्ष्मी व्रत, नवरात्रि का व्रत, विजय दशमी, करवाचौथ, अन्नकूट, भ्रातृद्वितीया, मकर संक्रान्ति, वसन्त पंचमी, शिवरात्रि व होली हैं। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में पूर्णिमा का भी महत्व है। इन विविध पर्वों पर कन्नौजी भाषा में विविध लोकगीत गाए जाते हैं। एक कन्नौजी लोकगीत देखिए, जिसमें देवी मां की भक्तिन पूजा करने जाती है कि बीच में ही बदरिया आती है। एक दम अंधिरिया छा जाती है-
सोने के थारी में भोजन परोसे / मइयै मिलन हम आई रे, झुकि आई अंधिरिया।/ मइयै जिमाउन हम आई रे, झुकि आई अंधिरिया।/ मइयै सुवाउन हम आई रे, झुकि आई अधिरिया।/ पाना पचासी, महोबे को बीड़ा। मइये रचाउन हम आरे रे, झुकि आई अंधिरिया।
होली के गीतों में हास्य और व्यंग्य की प्रधानता रहती है। गांवों में महिलाएं ढोलक की थाप पर गाती हैं-
फागुन में रंग बरसै नंदलाल/ अबेर भई गोकुल में होरी खेलन चलौ।
इसी प्रकार कजरी, सावन, धमार और भजनपरक गीत भी प्रचलित हैं, जो धार्मिक आस्था और प्राकृतिक उल्लास का संगम प्रस्तुत करते हैं।
भावात्मक और प्रेमपरक गीत
कन्नौजी लोकगीतों में प्रेम, विरह और सौंदर्य की भावनाएं भी प्रमुखता से मिलती हैं। मेरा रेशमी दुपट्टा जरा गोटा लगा दो/ जरा गोटा लगा दो... सोने की थाली में भोजन बनाए/ मेरा जेमन वाला दूर बसा/ कोई जल्दी बुला दो...
कभी ये गीत सीधी सच्ची प्रेमाभिव्यक्ति होते हैं, तो कभी सांकेतिक और रूपकात्मक। स्त्री का विरह, पति की प्रतीक्षा, साजन की विदाई- ये सब विषय बार-बार आते हैं।
साउन लागे आज सुहावन जी।/ एजी कोइ घटा दबी हई कोर।/ नन्हीं-नन्हीं बुंदियन मेंह बरसी रहे।/ एजी कोई पवन चले सईंजोर। ऐसे गीतों में भाषा की मिठास और भावनाओं की गहराई दोनों अद्भुत रूप से मिलती हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
कन्नौजी लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना के दर्पण हैं। इन गीतों से समाज की संरचना, नारी की भूमिका, नैतिक मूल्यों और लोकाचारों की झलक मिलती है। इनके माध्यम से लोकसंस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होती रही है। महिलाओं के लिए ये गीत स्व-अभिव्यक्ति का साधन हैं - वे अपनी भावनाएं, पीड़ा, आनंद औरआकांक्षाएं इन्हीं गीतों में व्यक्त करती हैं।
स्व-अभिव्यक्ति का एक उदाहरण देखें, जिसमें ससुराल की पीड़ा भी अभिव्यक्त होती है- हमारी गुलाबी चुनरिया, हमें लागी नजरिया।/ सासु हमारी जन्म की बैरिन/ हमसे करामैं रसुइया, मेरी बारी उमरिया/ जेठानी हमारी जन्म की बैरिन/हमसे
भरामैं गगरिया, मेरी बारी उमरिया...
इस प्रकार कह सकते हैं कि कन्नौजी लोकगीत उत्तर भारत की समृद्ध लोकपरंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं। इन गीतों में जीवन की गंध है, मिट्टी की महक है और इंसान की सहज भावनाओं की सच्चाई है। आज जब आधुनिकता और तकनीक के प्रभाव से लोकसंगीत का स्वर क्षीण हो रहा है, तब इन लोकगीतों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। कन्नौजी लोकगीत न केवल कान्यकुब्ज क्षेत्र की पहचान हैं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति की जीवंत धरोहर भी हैं। इन गीतों को सुनना, गाना और सहेजना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
