लखनऊ मेट्रो में गंभीर अनियमितताएं! CAG रिपोर्ट में सपा-भाजपा दोनों सरकारों पर सवाल... स्टेशन हटाया, करोड़ों अतिरिक्त भुगतान, सुरक्षा चूक... जानें पूरा मामला
लखनऊ, अमृत विचार: लखनऊ मेट्रो रेल परियोजना के निर्माण में अनुबंध शर्तों के उल्लंघन करने के साथ अतिरिक्त भुगतान किया गया और संचालन में सुरक्षा चूक भी हुई है। ये खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट में परियोजना के निर्माण एवं संचालन में प्रशासनिक लापरवाही, वित्तीय अनियमितता और अनुबंध शर्तों का उल्लंघन करने की बात कही गई है। सीएजी ने नवंबर 2013 से मार्च 2023 तक की अवधि के दौरान परियोजना के नियोजन, निर्माण, संचालन और राजस्व प्रबंधन की विस्तृत समीक्षा की। इससे सपा और भाजपा दोनों सरकारों के कार्यकाल में परियोजना की कार्यशैली पर सवाल उठाए गए हैं। अनुबंध शर्तों के उल्लंघन, अतिरिक्त भुगतान और सुरक्षा चूकों के लिए उत्तरदायित्व तय करने और वसूली सुनिश्चित करने की सिफारिश भी की गई है।
राज्य विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत की गई सीएजी के निष्पादन लेखापरीक्षा प्रतिवेदन संख्या-12 (वर्ष 2025) में प्रदेश सरकार द्वारा 2013-14 के बजट में घोषित लखनऊ मेट्रो परियोजना को लागू करने के लिए गठित लखनऊ मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बाद में उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड) ने उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर (22.88 किमी) का निर्माण सितंबर 2014 में शुरू कर मार्च 2019 में पूरा किया। सीएजी ने पाया कि परियोजना को भारत सरकार की सैद्धांतिक स्वीकृति 22 स्टेशनों के लिए मिली थी, लेकिन कंपनी ने बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के एक महत्वपूर्ण स्टेशन ‘महानगर मेट्रो स्टेशन’ को परियोजना से बाहर कर दिया, जबकि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में इसे वर्ष 2021 में दूसरे सबसे अधिक यात्री भार वाला स्टेशन माना गया था।
अनुबंध प्रबंधन में भारी गड़बड़ी
लेखापरीक्षा में सामने आया कि परियोजना के तहत किए गए कई अनुबंधों में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन का अभाव रहा। तकनीकी मूल्यांकन समिति की संस्तुति के बावजूद एक ठेकेदार की वित्तीय निविदा न खोले जाने को सीएजी ने अनुचित ठहराया। इसके अलावा, एलकेसीसी-07 अनुबंध के तहत ₹15.75 करोड़ की लागत वाला कार्य ₹51.40 करोड़ में पूरा किया गया, लेकिन लेखापरीक्षा को केवल ₹1.30 करोड़ के कार्य मदों का ही विवरण उपलब्ध कराया गया। इस पर राज्य सरकार की ओर से कोई स्पष्ट उत्तर भी नहीं दिया गया। विज्ञापन अनुबंधों में भी गंभीर चूक सामने आई। 12 ट्रेन सेटों के लिए दिए गए विज्ञापन अधिकारों के बदले लाइसेंसधारक से शुल्क वसूलने के बजाय उसे भुगतान से मुक्त कर दिया गया, जबकि अनुबंध के अनुसार शुल्क वसूली अनिवार्य थी। सीएजी ने इसे राजस्व हानि का स्पष्ट मामला बताया।
रॉयल्टी, भूमि और सुरक्षा से खिलवाड़
परियोजना प्राधिकारियों द्वारा ठेकेदारों से फॉर्म एमएम-11 (ट्रांजिट पास) प्राप्त किए बिना भुगतान किया गया और ₹3.16 करोड़ की रॉयल्टी व खनिज मूल्य की कटौती नहीं की गई। इसके अतिरिक्त, मेट्रो डिपो के लिए खरीदी गई भूमि का एक हिस्सा विवादित होने के बावजूद उस पर निर्माण किया गया। गैर-पंजीकृत त्रिपक्षीय समझौते के आधार पर किया गया यह निर्माण सीएजी के अनुसार वित्तीय नियमों और विधिक प्रावधानों के विरुद्ध था। संचालन एवं रखरखाव के दौरान भी सुरक्षा मानकों में चूक सामने आई। आईआईटी कानपुर द्वारा किए गए परीक्षणों में रेल पटरियों का ‘कठोरता मान’ भारतीय रेलवे मानकों से कम पाया गया। इसके अलावा, अंतरिम गति प्रमाण-पत्र का समय पर नवीनीकरण न कर यात्रियों की सुरक्षा को जोखिम में डाला गया, और साइबर सुरक्षा के लिए प्रमाणित एजेंसी की नियुक्ति भी नहीं की गई।
राजस्व बढ़ा, पर अवसर गंवाए गए
हालांकि, परिचालन राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई और पांच वर्ष बाद परिचालन व्यय से अधिक राजस्व अर्जित हुआ, लेकिन सीएजी ने पाया कि यात्री संख्या और राजस्व, डीपीआर में अनुमानित लक्ष्यों से काफी कम रहे। मार्च 2025 तक हजारों वर्गफीट वाणिज्यिक स्थान और पार्किंग क्षेत्र पट्टे पर नहीं दिए जा सके, जिससे संभावित आय का नुकसान हुआ।
अनियमितता के प्रमुख मामले
• बिना अनुमति ‘महानगर मेट्रो स्टेशन’ हटाया गया
• ₹15.75 करोड़ का कार्य ₹51.40 करोड़ में पूरा
• विज्ञापन लाइसेंस शुल्क की वसूली नहीं
• ₹3.16 करोड़ रॉयल्टी/खनिज शुल्क की कटौती नहीं
• विवादित भूमि पर डिपो का निर्माण
सुरक्षा और संचालन में रेड फ्लैग्स
• रेल पटरियों की कठोरता मानक से कम
• अंतरिम गति प्रमाण-पत्र का नवीनीकरण नहीं
• साइबर सुरक्षा एजेंसी की नियुक्ति नहीं
राजस्व और संपत्ति विकास में चूक
• 54,196 वर्गफीट वाणिज्यिक स्थान खाली
• 15,984 वर्गफीट पार्किंग पर निविदा नहीं
• संपत्ति विकास हेतु भूमि वर्षों तक अनुपयोगी
