काव्य : युद्ध सदा देता हमें, गहरे त्रासद घाव...

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युद्ध सदा देता हमें, 
गहरे त्रासद घाव। 
शांति अथवा युद्ध में, 
करिए उचित चुनाव।
आम नागरिक झेलते, महायुद्ध का दंश।
होते सैनिक हताहत, 
कई डूबते वंश।

महायुद्ध की आग में,
झुलस रहा संसार। 
पर्यावरण विनाश से, 
चहुंदिश हाहाकार। 
सृजन, शांति, समृद्धि को, युद्ध ले रहे लील।
मानवता के पक्षधर, 
हों संवेदनशील।

हमें डराता युद्ध 
भय, छीन ले रहा चैन।
पीड़ा के दुःस्वप्न ही, 
सता रहे दिन-रैन।
ड्रोन, मिसाइल, बमों से, 
चले युद्ध का खेल।
धनी, घमंडी देश के, डाले कौन नकेल।

ऊर्जा संकट बढ़ गया, महंगाई की मार।
महाशक्तियां युद्ध में, 
करतीं नरसंहार।

टूटे घर, उजड़े शहर, बिखर गए परिवार।
जीत-हार को स्वप्नवत, 
युद्ध करे स्वीकार।

समझौता, संवाद से, 
होते युद्ध समाप्त।
प्रेम-शांति संतुलन ही, कण-कण में है व्याप्त।
दुष्टों के संहार हित, आवश्यक है युद्ध।
संकट हो जब देश पर, 
उचित न बनना बुद्ध।

हों न चिरस्थायी कभी, 
परम शत्रु या मित्र। 
अहंकार के नाम पर,
बदले चाल-चरित्र। 
युद्ध समस्या का कभी,
होता नहीं निदान।
हार-जीत के चक्र में, महाध्वंश प्रतिमान।

गौरीशंकर वैश्य विनम्र, लखनऊ

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