पश्चिमी यूपी : गन्ना किसानों के करोड़ों रुपये का भुगतान फिर अटका

Amrit Vichar Network
Published By Virendra Pandey
On

लखनऊ, अमृत विचार : पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, शामली, बिजनौर और बागपत जिलों में गन्ना किसानों का भुगतान संकट एक बार फिर गहरा गया है। इन छह जिलों की करीब 30 चीनी मिलों पर किसानों का लगभग 1878 करोड़ रुपये बकाया है। हर साल दोहराई जाने वाली यह समस्या इस बार भी किसानों की आर्थिक सेहत पर भारी पड़ रही है। यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है, क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में गन्ना हमेशा केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है।

केवल आठ मिलें ही पूरी तरह भुगतान कर पाई हैं, जबकि बाकी मिलों में भुगतान आंशिक है या काफी पीछे चल रहा है। गन्ना इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और भुगतान रुकते ही गांवों में नकदी का प्रवाह ठप हो जाता है। इसका असर खेती, बाजार और छोटे कारोबार तक दिखाई देने लगा है। मेरठ में हालात सबसे गंभीर हैं। यहां बजाज की किनोनी मिल पर किसानों का 60 प्रतिशत से अधिक गन्ना मूल्य बकाया है। इस मिल पर किसानों का लगभग 350 करोड़ रुपये बकाया है। भुगतान के लिए किसान दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन उनकी सुनी नहीं जा रही है। जबकि मोहिउद्दीनपुर और सकौती मिलों पर भी करोड़ों रुपये लंबित हैं। मुजफ्फरनगर में 283 करोड़, सहारनपुर में 237 करोड़ और शामली में 312 करोड़ रुपये का भुगतान बाकी है। बागपत की मलकपुर चीनी मिल में मंगलवार को अपर गन्ना आयुक्त वीबी सिंह व डिप्टी केन कमिश्नर राजीव राय ने मिल अधिकारियों की बैठक ली। जहां किसानों का बकाया गन्ना भुगतान प्राथमिकता पर करने के निर्देश दिए। मलकपुर मिल पर किसानों का 2025-26 के पेराई सत्र का करीब 350 करोड़ रुपये बकाया है। यही हाल रमाला मिलों का भी है।

भुगतान में देरी से किसानों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। उन्हें बच्चों की फीस, खेती की लागत और घरेलू खर्च के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है। गन्ना विभाग के एक शीर्ष अधिकारी का कहना है कि सरकार की ओर से भुगतान सुनिश्चित करने के लिए नोटिस, रिकवरी और एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।

उत्पादन घटा, नंबर वन की कुर्सी गई

2025-26 के पेराई सत्र में उत्तर प्रदेश का चीनी उत्पादन घटकर करीब 89 लाख मीट्रिक टन रह गया, जो पिछले वर्ष 91 लाख मीट्रिक टन था। इस गिरावट के साथ प्रदेश देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य नहीं रह गया और महाराष्ट्र आगे निकल गया। विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि पूरे गन्ना अर्थतंत्र के दबाव का संकेत है।

खांडसारी इकाइयों की ओर झुके किसान

इस सत्र में बड़ी मात्रा में गन्ना खांडसारी इकाइयों की ओर गया। कारण साफ है कि बेहतर दाम और जल्दी भुगतान। जहां मिलों का राज्य परामर्शित मूल्य करीब 400 रुपये प्रति क्विंटल रहा, वहीं खांडसारी इकाइयों ने 450 रुपये तक कीमत दी। इससे मिलों को पर्याप्त गन्ना नहीं मिला और उत्पादन प्रभावित हुआ।

संकट की मुख्य वजहें

• मौसम का असर: फरवरी में गर्मी और मार्च में बारिश से फसल प्रभावित

• गन्ना सीओ-0238 किस्म में सड़न से उत्पादन में गिरावट

• मिलों द्वारा भुगतान में देरी से किसानों का भरोसा कम

• खांडसारी इकाइयों की ओर गन्ने का रुख

• मिलों की वित्तीय स्थिति और प्रबंधन की समस्याएं

संबंधित समाचार