बच्चों के लिए अनुशासन जुल्म न बन जाए

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
On

0
राजेश जैन, वरिष्ठ पत्रकार 

 

कानपुर की एक अदालत की पांचवीं मंजिल से कूदकर जान देने वाले 24 वर्षीय प्रशिक्षु अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। मरने से पहले लिखे गए उनके सुसाइड नोट में आर्थिक संकट, प्रेम प्रसंग या करियर में असफलता का उल्लेख नहीं था। उसमें बार-बार बचपन से महसूस किए गए अपमान, भय, नियंत्रण और भावनात्मक घुटन का जिक्र था, जिसे उन्होंने अपने पिता की कठोरता से जोड़ा, हालांकि सुसाइड नोट में लिखी बातें व्यक्तिगत आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि जांच का विषय है, फिर भी यह घटना भारतीय पैरेंटिंग के उस चेहरे को सामने लाती है, जिस पर समाज लंबे समय से आंखें मूंदे बैठा है।

‘पापा जीत गए, उन्हें जीत मुबारक हो’— यह वाक्य सिर्फ एक बेटे की अंतिम पीड़ा नहीं, बल्कि उस परवरिश मॉडल पर सवाल है, जिसमें अनुशासन के नाम पर अपमान, नियंत्रण और डर को सामान्य मान लिया जाता है। यह घटना हमें मजबूर करती है कि हम पूछें— क्या हम अपने बच्चों को संवार रहे हैं, या अनजाने में तोड़ रहे हैं?

हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा सफल बने, अनुशासित रहे और जीवन में भटके नहीं। डांटना, टोकना, सीमाएं तय करना और गलतियों पर रोक लगाना पैरेंटिंग का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब अनुशासन सम्मान के साथ न होकर अपमान के साथ दिया जाने लगे। जब हर गलती पर चरित्र पर हमला हो, हर असहमति को बदतमीजी कहा जाए और हर निर्णय भय से मनवाया जाए, तब अनुशासन धीरे-धीरे जुल्म में बदल जाता है। सार्वजनिक रूप से बेइज्जत करना, लगातार शक करना, हर गतिविधि पर नियंत्रण रखना और भावनाओं को महत्वहीन बताना बच्चे को सुधारता नहीं, भीतर से कमजोर करता है।

हमारे समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि ‘मार-डांट से ही बच्चे बनते हैं।’ अनेक माता-पिता अपनी कठोरता को प्रेम और जिम्मेदारी का हिस्सा मानते हैं। उन्हें लगता है कि डर रहेगा, तो बच्चा अनुशासित रहेगा और गलत रास्ते पर नहीं जाएगा। कई बार वे गर्व से कहते हैं, ‘हमने भी अपने मां-बाप से मार खाई है, तभी कुछ बन पाए हैं,’ लेकिन यह तर्क इस तथ्य को नजरअंदाज कर देता है कि हर पीढ़ी की मानसिक और भावनात्मक जरूरतें अलग होती हैं। आज का बच्चा केवल आदेश नहीं, संवाद चाहता है; केवल नियंत्रण नहीं, सम्मान चाहता है।

लगातार डांट, ताने, तुलना और अपमान झेलने वाला बच्चा धीरे-धीरे अपना आत्मविश्वास खोने लगता है। उसे महसूस होने लगता है कि वह कभी पर्याप्त अच्छा नहीं हो पाएगा। वह हर समय गलती के डर में जीता है और अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति दबाने लगता है। ऐसे बच्चे बाहर से आज्ञाकारी दिख सकते हैं, लेकिन भीतर से लगातार चिंता, आत्मसम्मान की कमी और भावनाओं को दबाकर रखने की प्रवृत्ति से जूझ रहे होते हैं। कुछ बच्चे विद्रोही बन जाते हैं, कुछ पूरी तरह चुप। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है, जब बच्चा अपनी पीड़ा व्यक्त करना ही बंद कर देता है।

भारतीय परिवारों में बच्चों पर करियर, विषय, जीवनशैली और यहां तक कि मित्र चुनने तक का दबाव असामान्य नहीं है। ‘हम तुमसे ज्यादा जानते हैं’, ‘तुम्हारे भले के लिए कह रहे हैं’— इन वाक्यों के पीछे कई बार बच्चे की व्यक्तिगत पहचान दब जाती है। हर बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर, वकील या अफसर नहीं बनना चाहता। हर बच्चा एक जैसी क्षमताओं और रुचियों के साथ पैदा नहीं होता। जब उसकी पसंद, क्षमता और व्यक्तित्व की अनदेखी कर सिर्फ अपेक्षाएं थोपी जाती हैं, तो वह अपने ही जीवन से कटने लगता है।

बहुत से माता-पिता यह मानते हैं कि लोगों के सामने डांटने से बच्चा सुधर जाएगा, जबकि मनोविज्ञान बताता है कि सार्वजनिक अपमान बच्चे के आत्मसम्मान पर गहरा प्रहार करता है। घर वह स्थान होना चाहिए, जहां बच्चा सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करे। यदि वहीं उसे बार-बार बेइज्जती मिले, तो उसके लिए दुनिया में कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचता। बच्चों की गलतियां सुधारी जानी चाहिए, लेकिन उनकी गरिमा तोड़े बिना। यह समझना भी जरूरी है कि अधिकतर कठोर माता-पिता अपने बच्चों से प्रेम करते हैं। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा सफल बने, सुरक्षित रहे और जीवन में आगे बढ़े। समस्या उनके इरादों में नहीं, तरीकों में होती है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)

संबंधित समाचार