हरियाली पर आरी:बरेली-मथुरा हाईवे पर हजारों पेड़ कटे, ग्रीनरी अब रेगिस्तान की राह

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
On

बरेली, अमृत विचार। विकास और विस्तार की आंधी रुहेलखंड से ब्रज तक किस तरह हरियाली पर बुरे प्रभाव डाल रही है, इस कड़वी सच्चाई को बरेली-मथुरा हाइवे चौड़ीकरण से बखूबी देखा-समझा जा सकता है। प्राकृतिक संपदा पर पूरी रफ्तार से आरी तो चल रही है मगर उसकी भरपाई को प्लांटेशन के प्लान जमीन पर बेहद कमजोर दिख रहे हैं। चौड़ीकरण परियोजना में हजारों पेड़ों को बलि दी जा चुकी है। बरेली जिले में ही रामगंगा पुल से आगे चाड़पुर, कोनी, मकरंदपुर, भमोरा, सिरोही, रसूलपुर आदि ग्रामीण इलाकों से गुजरने वाली सड़क जो कभी घने और छायादार पेड़ों से ढकी रहती थी, वह वहां रेगिस्तान जैसे नजारे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि हरियाली की भरपाई के बगैर इस तरह के प्रोजेक्टस किसी त्रासदी से कम नहीं साबित होंगे। दो साल पहले भी इसी मार्ग पर बदायूं रोड पर लाल फाटक से रामगंगा पुल के बीच सड़क चौड़ीकरण के लिए नौ हजार से अधिक पेड़ों कटान किया गया था। इसी तरह बरेली-पीलीभीत और बरेली-सीतापुर जैसे अन्य हाईवे प्रोजेक्ट्स में भी हजारों हरे-भरे पेड़ों का वजूद मिटाया जा चुका है। वैसे तो प्रशासन, वन विभाग मिलकर हर साल बेहिसाब प्लांटेशन के दावे करते हैं मगर मगर उस हिसाब से कहीं भी बड़े क्या, छोटे पेड़ भी नजर नहीं आ रहे। इसके दुष्प्रभाव भी नजर आने लगे हैं। सड़कों के किनारे केवल धूल के गुबार और भीषण गर्मी से लोग बेहाल हो रहे हैं। जिंदगी जैसे बिन छांव दौड़ने को मजबूर हो रही है। पर्यावरणविदों का साफ कहना है कि विकास और हरियाली के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो आने वाले समय में शहर और भी अधिक गर्मी और प्रदूषण की चपेट में आ सकता है।


बरेली कॉलेज के पर्यावरण विशेषज्ञ एसोसिएट प्रो. डा. जसपाल सिंह ने बताया कि किसी भी हाईवे प्रोजेक्ट में ग्रीनरी लॉस की भरपाई केवल नए पौधे लगाकर नहीं की जा सकती। एक पचास साल पुराने पेड़ की जगह दस छोटे पौधे उसका मुकाबला नहीं कर सकते। बरेली में जिस तरह लगातार हाईवे के लिए हजारों पेड़ काटे गए हैं, उससे ग्राउंड वाटर लेवल गिरेगा और ''हीट आइलैंड'' की समस्या पैदा होगी।-

दुकानदार संजीव के मुताबिक बदायूं हाईवे पर चाढ़पुर गांव के पास रोड किनारे मेरी दुकान है, पहले इस सड़क से गुजरते समय धूप का अहसास नहीं होता था, लोग पेड़ के नीचे रुककर आराम करते थे। क्योंकि बरगद और पीपल के पुराने पेड़ों ने छांव की चादर रहती थी। अब विकास के नाम पर सब उजाड़ दिया गया। गर्मी इतनी बढ़ गई है कि सड़क पर खड़ा होना मुश्किल है।

भारत वर्मा ने बताया कि शहर में चारों तरफ सड़क चौड़ीकरण की परियोजनाओं से सांसों पर संकट छाने वाला है। यह बात सही है कि सड़क चौड़ी होने से रास्ता आसान होगा, लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी पड़ेगी। बदायूं हाईवे पर अब सफर करना तपती भट्टी में चलने जैसा है। पेड़ों की छांव राहत देती थी। प्रशासन को चाहिए सड़क बनाने के साथ-साथ तुरंत पौधों का प्लांटेशन करें।

पीडी एनएचएआई बदायूं डिवीजन उत्कर्ष शुक्ला ने कहा कि सड़क चौड़ीकरण एक अनिवार्य विकास प्रक्रिया है, जिसके लिए नियमानुसार वन विभाग से अनुमति लेकर पेड़ हटाए गए हैं। पर्यावरण संरक्षण को लेकर हम गंभीर हैं, बरेली-मथुरा फोरलेन की जद में आने वाले जो पेड़ काटे गए हैं उनके बदले निर्धारित स्थानों पर पौधारोपण का बजट जारी कर दिया गया है। जनता को जल्द ही बेहतर सड़क और स्वच्छ वातावरण दोनों मिलेंगे।

संबंधित समाचार