पिकनिक स्पॉट में बदलते तीर्थस्थान, दिलचस्प हैं नतीजे 

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Published By Anjali Singh
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बचपन की बात है। हमारा पूरा परिवार हरिद्वार गया था, मेरे माता-पिता, हम तीनों बच्चे और दादी। गर्मी के दिन थे। प्रोग्राम ये बना कि हरिद्वार और आस-पास के तीर्थ तो घूमेंगे ही, साथ में गर्मी से भी थोड़ी मुक्ति मिल जाएगी। उस समय जो देखा वो ये था कि मंदिर और धर्मशालाएं बहुतायत से थीं, होटल भी थे, लेकिन बहुत कम। आना-जाना ज्यादातर पैदल ही होता था, खाने के लिए ज्यादातर ढाबे थे या फिर छोटे-छोटे होटल, जिनमें सामान्य भोजन मिलता था। सबसे न्यारा दृश्य होता था सुबह, शाम और रात को हर की पैड़ी पर होने वाला स्नान और लोगों का कोलाहल। हम लोग भी शाम को लगभग रोज ही वहां जाते थे ढेर सारे आम और लीची के साथ। पोटली मे बांधकर आम और लीची गंगाजी में डुबोकर, जब ठंडी हो जाए तो खाते थे और हर की पैडी के नज़ारे का आनंद लेते थे। भीड़ भाड़ भी बहुत नहीं होती थी। कुल मिलाकर खुशनुमा माहौल था, जिसमे तीर्थ तो माता पिता और दादी ने किया हम बच्चों ने तो घूमने फिरने का आनंद लिया। 

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इसके बाद अभी तीन साल पहले हरिद्वार जाना हुआ। इतना शोर,गंदगी और भीड़-भाड़ कि पूछो मत। गंगा आरती मे जबरदस्त भीड़ और लगातार चंदा मांगते गंगा सेवा समिति के पंडे। मैंने पूछा तो पता चला हर शनिवार, रविवार को दिल्ली तक से लोग हरिद्वार आते हैं, हर तरह की सुविधाओं वाले होटलों मे रुककर पिकनिक मनाकर वापस चले जाते हैं।  देखा जाए तो पिछले 20-25 सालों से तीर्थ यात्रा के पर्यटन में बदल जाने की ये कहानी है बड़ी दिलचस्प, पाठकों मे से जो उम्र दराज होंगे, उनमें से बहुतों ने मेरी तरह इस बदलाव को देखा भी होगा। बदले आर्थिक माहौल ने सारे समाज पर प्रभाव डाला तो तीर्थ पर जाने वाले भी उससे प्रभावित कैसे नहीं होते? पहले तीर्थ पर जाने का मतलब होता था, सारा ध्यान पूजा-पाठ और भक्ति में लगाना और थोड़ा बहुत आस-पास के प्रसिद्ध स्थान भी देखना। जैसा मैंने बताया तीर्थ यात्रा करने के दौरान आरामदेह तरीके से रुकना और स्वादिष्ट खाना-पीना लोगों की प्राथमिकता मे नहीं होता था। हां एक बात और थी तीर्थ स्थानों पर जो पंडे-पुजारी और साधू मिलते थे अधिकांश निर्विकार होते थे, लालची भी थे, लेकिन बहुत कम। तीर्थ यात्रा का ये नजारा मोटे तौर पर सन् 2000 के आस-पास तक जारी रहा। इसके बाद भारतीय समाज ने बदलाव का एक नया दौर देखा। अर्थव्यवस्था में आई संपन्नता की वजह से भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से की मानसिकता में बदलाव आया और उसकी प्राथमिकताओं में भी। 

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धर्मभीरु भारतीय समाज में तीर्थ यात्रा अभी भी पहली प्राथमिकता रही, लेकिन अब सुख सुविधाओं की तरफ भी लोगों का ध्यान जाने लगा। इस बदलाव की ओर तीर्थ स्थानों में बैठे पंडे- पुजारिओं और व्यापारियों का ध्यान भी गया। अब लोगों की जेब में पैसा था और तीर्थ स्थानों मे बैठे लोगों के पास जमीन, आश्रम और व्यापारी के पास पैसा। नतीजे में तीर्थस्थानों में पर्यटन सरीखी सुविधाएं देने की होड़ शुरू हो गई। नए-नए होटल तो बनने ही लगे आश्रम भी होटल सरीखे ही सुविधा संपन्न होने लगे। खाने-पीने की सुविधाएं भी मिलने लगीं। ये व्यवस्था होने लगी की जो जैसा भोजन चाहे उसे उपलब्ध कराया जाए। इस तरह से पूरा माहौल पिकनिक सरीखा होने लगा। अब एक पंथ दो काज वाला माहौल तीर्थस्थानों पर बन गया। यानी लोग तीर्थ के साथ पर्यटन का आनंद भी लेने लगे। ये बदलाव एक तरीके से सकारात्मक ही रहा, लेकिन धन का स्वभाव है कि वो अपने साथ लालच भी लाता है। तीर्थ स्थानों में भी वही हुआ और अधिक धन की लालच मे तीर्थ स्थानों पर वो सुविधाएं भी मिलने लगीं, जो शुद्ध व्यावसायिक हैं, जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और जो उस इलाके के लिए कालांतर मे घातक साबित होंगी , कई जगहों पर ऐसा होने भी लगा है। 

अब जैसे ट्रेकिंग को ही लीजिए, पर्यटकों की डिमांड को पूरा करने के लिए तमाम जगहों पर ट्रेकिंग करवाई जाने लगी है, जिनसे पहाड़ों मे कई जगहों पर कूड़े और प्लास्टिक के कचरे के ढेर लगने लगे हैं। इसी हरिद्वार में ही शोभा के लिए गंगा आरती होती थी। उसकी सफलता से प्रेरित होकर अब गंगा आरती को एक तरह से व्यावसायिक रूप दे दिया गया है। भारी भीड़ होने लगी है और आरती खत्म होने के बाद घाटों पर गंदगी का अंबार लग जाता है, इतने से ही संतोष नहीं हुआ, तो लोग अब खास तौर से पहाड़ों वाले तीर्थ स्थानों पर परलोक सुधारने के लिए बसने भी लगे हैं। ऐसे लोगों ने तीर्थों को और प्रदूषित कराना शुरू कर दिया है। अति हर चीज की बुरी होती है। इसलिए जरूरी है कि कुछ हम खुद पर लगाम लगाएं और सरकार की तरफ से नए सिरे से कुछ नियोजन हो। वरना कालांतर में तीर्थ स्थान व्यापार के शुद्ध केंद्र बन जाएंगे और उनका स्वरूप ही बिगड़कर नष्ट हो जाएगा। बदले आर्थिक, सामजिक संदर्भों मे तीर्थ यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलें, ये बात तो समझ मे आती है, लेकिन इन सुविधाओं के कारण तीर्थ स्थान, पर्यटन केंद्र मे बदल जाएं ये न तो तीर्थ यात्रियों के हित मे होगा न ही पर्यटकों के।

अनेहस शाश्वत

 

 

 

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