लखनऊ के बाजारों में महमूदाबाद की लीची की मिठास, फल विक्रेताओं ने पहले से ही शुरू की एडवांस बुकिंग

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Published By Anjali Singh
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सीतापुर। उत्तर प्रदेश में सीतापुर जिले की महमूदाबाद तहसील में पैदा होने वाली छोटे बीज और अधिक गूदे वाली लीची इस बार लखनऊ समेत आसपास के जिलों के बाजारों में विशेष आकर्षण का केंद्र बनेगी। स्थानीय बागवानों की लीची फसल को लेकर व्यापारियों में उत्साह है और लखनऊ के फल विक्रेताओं ने पहले से ही किसानों से खरीद शुरू कर दी है। जिला उद्यान अधिकारी राजश्री ने सोमवार को बताया कि महमूदाबाद क्षेत्र के बागवान लीची उत्पादन में लगातार आगे बढ़ रहे हैं और उनकी उपज को लखनऊ के बाजारों से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। 

बाजार में अच्छी मांग

इससे किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है। उन्होंने बताया कि मीरा नगर, ठाकुरपुर, सैदपुर और आसपास के गांवों में बड़े पैमाने पर लीची की बागवानी की जाती है। यहां शाही रोज, सेंटर बेदाना, अर्ली बेदाना, चीन, कलकतिया और कश्मीर जैसी उन्नत किस्मों की खेती हो रही है, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है। उप कृषि निदेशक श्रवण कुमार सिंह ने बताया कि महमूदाबाद क्षेत्र की लीची की खासियत यह है कि यहां की बागवानी मुख्य रूप से जैविक तरीके से की जाती है।

लाभकारी नगदी फसल साबित हो रही

बागानों में रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग बेहद कम होता है और किसान नीम की पत्तियों से तैयार घोल का उपयोग करते हैं। इससे लीची की गुणवत्ता और स्वाद बेहतर बना रहता है। उन्होंने बताया कि एक लीची के पेड़ से औसतन 50 से 80 किलोग्राम तक फल प्राप्त होते हैं तथा एक हेक्टेयर में लगभग 150 पेड़ लगाए जाते हैं। इससे किसानों को अच्छी आमदनी होती है और यह क्षेत्र के लिए लाभकारी नगदी फसल साबित हो रही है। 

कृषि वैज्ञानिक दयाशंकर श्रीवास्तव ने बताया कि महमूदाबाद की लीची का सबसे बड़ा लाभ यह है कि लखनऊ की फल मंडी नजदीक होने के कारण किसानों को परिवहन में सुविधा रहती है और फलों के खराब होने का खतरा भी कम रहता है। उन्होंने कहा कि लगभग एक सप्ताह बाद यहां की लीची बड़ी मात्रा में लखनऊ मंडी पहुंचने लगेगी। 

लीची उत्पादन का इतिहास बताते हुए अधिकारियों ने कहा कि महमूदाबाद रियासत के समय राजा महमूदाबाद अपने मेहमानों के लिए बिहार के मुजफ्फरपुर से विशेष "कलकतिया" लीची मंगवाते थे। गर्मी में फल खराब होने की समस्या को देखते हुए बाद में महमूदाबाद में ही लीची के बाग लगाए गए, जिसके बाद यहां लीची उत्पादन की परंपरा शुरू हुई और आज यह क्षेत्र प्रदेश में अपनी अलग पहचान बना चुका है। 

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