घने अंधकार में ले जाता है पापकर्म
मन से दूसरे का अहित सोचना, वचन से दूसरे के प्रति कुशब्दों का प्रयोग करना तथा शरीर से दूसरे को किसी प्रकार की हानि पहुंचा देना मन में अशान्ति उत्पन्न करता है। अन्दर ही अन्दर एक भय रहेगा। पाप को जब तक आप अपने मन में छिपाए रहेंगे, तब तक आत्मग्लानि से भरे रहेंगे। मानव के कई व्यक्तित्व हैं। उनमें से आध्यात्मिक व्यक्तित्व सांसारिक संकीर्णताओं से परे है। इसका रूप सूक्ष्म और विशाल है। यह द्वेष-ईष्र्यारहित है। यह सांसारिक विषय-वासनाओं पर नियंत्रण करने वाला है। मनुष्य जब पाप करता है तब उसका यही आध्यात्मिक व्यक्तित्व कचोटता है। इसीलिए पाप और विकारमय व्यक्तित्व डरता रहता है। मन सदा बेचैन रहता है। आध्यात्मिक अंकुश की पैनी मार उसे उसे व्यथित किया करती है।
सामान्यतः यह कहा जा सकता है कि जिन कर्मों से मनुष्य नीचे गिरता है, उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, उसे पाप कहते हैं। इसके विपरीत जिन शुभ कर्मों के करने से बुद्धि स्वच्छ एवं निर्मल होने लगती है और आत्मा सन्तुष्ट रहती है, वे पुण्य हैं। पाप से मन में कुविचार और कुकर्मों के प्रति वृत्ति उत्पन्न होती है, पुण्य से अन्तःकरण शुद्ध होता है। शास्त्रों में 5 महापातकों का वर्णन मिलता है- ब्रह्महत्या अर्थात वेदज्ञ-तपस्वी ब्राह्मण की हत्या करना, सुरापान, गुरू पत्नी के साथ अनुचित सम्बन्ध, चोरी तथा इन महापातकियों के साथ रहना। इनके अतिरिक्त कई छोटे-छोटे पाप हैं जिनसे मनुष्य मानसिक व्यभिचार की ओर अग्रसर होता है। मन के समस्त पाप इस प्रकार के कुचिन्तन से ही प्रारम्भ होते हैं।
बीज में वृक्ष की तरह शरीर में वासनाएं छिपी रहती हैं। तनिक सा प्रोत्साहन पाकर ये भड़क उठती हैं और गन्दगी की ओर प्रेरित करती हैं। मन के गुप्त प्रदेश में छिपी हुई ये गन्दी वासनाएं ही हमारे गुप्त शत्रु हैं। वासना बन्धन का, नाश का, पतन का और अवनति का मुख्य कारण है। विवेकवान पुरूष को वासना की भयंकरता से सदा सावधान रहना चाहिए। यही सांसारिक चिन्ताओं को उत्पन्न करने वाली विभीषिका है। यहां प्रश्न उठता है कि पापों से कैसे बचा जा सके। पाप का जन्म मानव के मन में होता है। अतः मन का सुधार ही आवश्यक है। मन की स्वच्छता से ही पाप से बचाव का कार्य प्रारम्भ होना चाहिए। मन को शुद्ध सात्विक विचारों से परिपूर्ण रखना चाहिए। मन में किसी प्रकार के विकार के आते ही सावधान हो जाना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, वासना, घृणा, भय आदि भावनाएं संकुचित व्यक्तित्व बनाती हैं। इससे व्यक्तित्व प्रभावहीन और निर्बल पड़ जाता है। इसी गन्दगी के कारण मनुष्य अपने भीतर नही झांक पाता।
भविष्य में किसी प्रकार का भी पाप न करने का दृढ़ संकल्प और उसका अभ्यास पाप-मुक्ति का साधन है। अथर्ववेद (4/23/1) कहता है- स नो मुच्चत्वंहसः। अर्थात वह ईश्वर हमें पाप से मुक्त करे। पाप एक वृक्ष के समान है, उसका बीज है लोभ। मोह उसकी जड़ है। असत्य उसका तना और माया उसकी शाखाओं का विस्तार है। दम्भ और कुटिलता पत्ते हैं। कुबुद्धि फूल है। किसी भी घोर अन्धकार गुफ में भी यदि पाप किया जाये वह एक न एक दिन प्रकट होकर ही रहता है। आप लोगों को धोखा दे सकते हैं पर प्रकृति को धोखा नहीं दिया जा सकता है। मनुष्य के दिव्य मन में किसी अज्ञात कोने में मैल और कूड़े-करकट की तरह शैतान का भी निवास है। जहां पुष्पों से सुरभित वन है, वहां काटों से भरे बीहड़ वन भी हैं। जहां सदज्ञान का दिव्य प्रकाश है, वहीं कहीं-कहीं घनघोर अन्धकार भी है। यही अन्धकार पाप की ओर ले जाकर मनुष्य के पतन का कारण बनता है।
हमारा अज्ञान ही हमें पाप की ओर खींचता है। क्षणिक वासना या थोड़े लाभ के अन्धकार में उसे उचित-अनुचित का विवके नहीं रहता। वह अपना स्थाई लाभ नहीं देख पाता और किसी न किसी पतन के मार्ग पर चल पड़ता है। पाप पशुत्व है। मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा का मैल है। दुखदाई नरक में ले जानेवाला दैत्य है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, अभिमान, शोक, ईष्र्या और निन्दा मनुष्य में रहने वाले ये दोष तनिक सा अनुकूल प्रोत्साहन पाते ही घास कूड़े की भांति बढ़ने लगते हैं और वर्षों की कीर्ति को धूमिल कर देते हैं।
मनुष्य प्रायः तीन अंगों से पाप की ओर अग्रसर होता है- शरीर, मन और वाणी। इसके द्वारा किए गये पाप कर्मों के कई रूप हो सकते हैं। विभिन्न अवस्थाएं और स्तर हो सकते हैं। इनसे सचेत रहें। शरीर द्वारा किए गये पापों में वे समस्त दुष्कृत्य सम्मिलित हैं, जिन्हें करने से ईश्वर के मन्दिर रूप इस मानव शरीर का क्षय होता है। कंचन तुल्य काया में कई रोग उत्पन्न होते हैं। जिनसे जीवित अवस्था में ही मनुष्य को कुत्सित कर्म की यन्त्रणाएं भोगनी होती हैं। ये सब आपके जीवन को गहरे अवसाद में ढकेल देंगी। ये एैसे निकृष्ट पाप हैं, जिसमें डूबने पर बड़े-बड़े राजाओं-महाराजाओं, अमीरों से लेकर असंख्य साधारण गृहस्थों का नाश हुआ है। इससे ईश्वररूपी हमारी आत्मा को बड़ा दुख होता है। मनुष्य आत्मग्लानि जैसे रोग का शिकार बन जाता है। जिससे आत्महत्या जैसी दुष्प्रवृत्ति जाग्रत होती है। पारिवारिक सौख्य, बच्चों एवं पत्नी का पवित्र पे्रम और समृद्धि नष्ट हो जाती है। सर्वत्र एक काला अंन्धकार मन, वाणी और शरीर पर छा जाता है।
ऐसे में मनःस्थिति अशान्त, सलज्ज, दुखपूर्ण होती है। उसमें द्वंद चलता रहता है और उसका अन्तःकरण कलुषित हो जाता है। ये सब मानसिक दुख नरक की दारूण यातना के समान कष्टकर हैं। मन में पापमय विचार रखना घातक है। आपका मन तो निर्मल शुद्ध देव-मन्दिर स्वरूप होना चाहिए। पाप पानी की तरह है। यह हमें नीचे की ओर खींचता है। इसी प्रकार चरित्र में दुर्गुण कोई क्यों न हो, आपकों नीचे की ओर ले जायेगा। आप चाहें कितना भी प्रयत्न करें, किन्तु आन्तरिक पाप से कलुषित मन स्पष्ट प्रकट हो जाता है। अवगुण से मनुष्य की उच्च सृजनात्मक शक्तियां पंगु हो जाती हैं। बुद्धि और प्रतिभा कुण्ठित हो जाती है। जब हम कोई गन्दा कार्य करते हैं, तो हृदय में एक गुपचुप पीड़ा का अनुभव होता रहता है। हमारे मन का दिव्य भाग हमें प्रताड़ित करता रहता है। दोषमुक्त होना हम सबका धर्म है। जो व्यक्ति जितने अंशों में दोषमुक्त है, उतने ही अंशों में दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ और उच्चतर है।
निरन्तर अपने मन, वचन तथा कार्यों द्वारा हर प्रकार के दोषों से मक्त रहने का प्रयत्न करते रहिए। सच्चे मन से प्रायश्चित के द्वारा भी पाप का शमन हो सकता है। अपने सद्गुणों के विकास के द्वारा ही हम दोषमुक्त हो सकते हैं। सर्वोत्तम प्रायश्चित वह है, जिसमें मनुष्य की पाप-प्रवृत्तियां फीकी पड़कर सद्गुणों तथा उच्चतर गुणों का विकास होता है। गलती की भरपाई आन्तरिक मन से होनी चाहिए। ऊपरी ताड़ना से वह थोड़ी देर के लिए दब जायेगी। जब उसे दबा दिया जाता है, तब अवसर पाते ही वह फोड़े में पीब की तरह फूट निकलती है और पतन की ओर ले जाती है।
पश्चाताप करना सात्विक मन का प्रतीक है। यह इस बात का सूचक है कि आपके अन्दर शिवत्व की दैवी भावना निवास करती है। सच्चे पश्चाताप की अग्नि में आपकी समस्त गन्दी वासनाएं दग्ध हो जायेंगी और आप निर्मल सोने के जैसे चमकने लगेंगे। पुण्य वह कार्य है, जिससे मनुष्य की निम्न प्रवृत्तियों का परिष्कार होता है। अधोगामी प्रवृत्तियां ऊध्र्वगामी बनती हैं और वासना के स्थान पर शिवत्व की जागृति होती है। पवित्र स्थानों का निवास, सत्संग, स्वाध्याय और समाज सेवा के पवित्र कार्यों से प्रवृत्तियां उच्च बनती हैं।
