संपादकीय: पूर्व का प्रवेशद्वार

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Published By Monis Khan
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म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग द्वारा अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत का चयन रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत और म्यांमार के संबंध कूटनीतिक के अलावा इतिहास, संस्कृति, सुरक्षा, व्यापार और भू-राजनीति के बहुस्तरीय ताने-बाने से जुड़े हुए हैं। ऐसे समय में जब चीन दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है, हमारे लिए म्यांमार केवल पड़ोसी देश ही नहीं, ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का वास्तविक प्रवेशद्वार बन चुका है। हमारी तीन प्रमुख विदेश नीति अवधारणाएं— ‘नेबरहुड फर्स्ट’, ‘एक्ट ईस्ट’ और हाल में घोषित ‘महासागर’ दृष्टिकोण— तीनों के लिए म्यांमार महत्वपूर्ण है।

म्यांमार दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सेतु है और अपने पूर्वोत्तर राज्यों को आसियान देशों से जोड़ने वाली सबसे व्यवहारिक स्थलीय कड़ी भी। ऐसे में लंबे समय से अटकी कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट परियोजना और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग को नई गति देने पर जोर देना उचित ही है। यदि ये परियोजनाएं समय पर पूरी हो जाती हैं, तो पूर्वोत्तर भारत के आर्थिक परिदृश्य में व्यापक बदलाव आएगा। व्यापार, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स और सीमापार औद्योगिक गतिविधियों के नए द्वार खुलेंगे। 

भारत-म्यांमार सीमा लगभग 1600 किलोमीटर लंबी और अत्यंत संवेदनशील है। ऐसे में समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और सीमा प्रबंधन पर दोनों देशों की सहमति केवल औपचारिक कूटनीति नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा का अनिवार्य तत्व है। चीन पहले ही म्यांमार के बंदरगाहों, ऊर्जा परियोजनाओं और सैन्य संपर्कों के माध्यम से वहां गहरी पैठ बना चुका है। भारत यदि इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति कमजोर होने देता है, तो उसका सीधा प्रभाव हिंद महासागर और पूर्वोत्तर भारत की सामरिक स्थिति पर पड़ सकता है। 

म्यांमार जैसे संसाधन-संपन्न देश के साथ रेयर अर्थ मेटल और खनिजों पर सहयोग पर सहयोग समझौते रणनीतिक महत्व के हैं, जो भारत को भविष्य की तकनीकी और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति दिला सकता है। इस पूरी कूटनीति के साथ कुछ नैतिक और राजनीतिक प्रश्न भी जुड़े हैं। म्यांमार इस समय सैन्य शासन के अधीन है और वहां लोकतंत्र समर्थक आंदोलन तथा सेना के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपने रणनीतिक हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन कैसे बनाए। भारत का दृष्टिकोण अब तक व्यावहारिक रहा है— वह म्यांमार में स्थिरता, संवाद और समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया की बात करते हुए संपर्क बनाए रखना चाहता है। दरअसल भारत यह समझता है कि म्यांमार को पूरी तरह चीन के प्रभाव क्षेत्र में छोड़ देना, उससे कहीं बड़ा रणनीतिक जोखिम होगा। 

असल प्रश्न यह है कि क्या भारत इस अवसर को रणनीतिक दूरदृष्टि के साथ उपयोग कर पाएगा? अतीत में कई परियोजनाएं नौकरशाही देरी, सुरक्षा चुनौतियों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण वर्षों तक अटकी रहीं। यदि भारत को वास्तव में दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रभावशाली भूमिका निभानी है, तो उसे केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर समयबद्ध निष्पादन, आर्थिक निवेश और विश्वसनीय कूटनीतिक उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी। म्यांमार आज भारत का पड़ोसी होने के साथ ही पूर्व की ओर खुलने वाला भू-राजनीतिक द्वार है। इस द्वार को खुला रखना भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं, सामरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव— तीनों के लिए अनिवार्य है।

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