रंग-तरंग : संथाली भाषा में शेक्सपियर के नाटक की प्रस्तुति
दिल्ली के सांस्कृतिक मंच पर अक्सर देश-विदेश की विविध संस्कृतियों और लोक कलाओं की झलक देखने को मिलती है। इसी कड़ी में, बीते सोमवार को दिल्ली के ‘कॉन्स्टीट्यूशन क्लब’ के ऑडिटोरियम में एक बेहद अनोखा और ऐतिहासिक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इतिहास में पहली बार, महान नाटककार विलियम शेक्सपियर के कालजयी नाटकों को भारत की प्राचीन जनजातीय भाषा ‘संथाली’ में एक फ्यूजन (मिश्रण) के रूप में मंच पर प्रस्तुत किया गया।
ओडिशा के जनजातीय छात्रों का जीवंत अभिनय इस भव्य प्रस्तुति को ओडिशा के दो प्रतिष्ठित संस्थानों- ‘कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी’ (KIIT) और ‘कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ (KISS) के जनजातीय छात्रों ने अपने शानदार और जीवंत अभिनय से मंच पर उतारा। छात्रों ने देश की हजारों साल पुरानी संथाली भाषा में संवाद कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। तीन महान कृतियों का अनूठा मिश्रण इस दो दिवसीय विशेष उत्सव के दौरान विलियम शेक्सपियर की तीन सबसे प्रसिद्ध कृतियों हैमलेट, मैकबेथ और रोमियो एंड जूलियट का मंचन किया गया।
इस प्रस्तुति की खास बात यह थी कि इसमें संथाली भाषा के साथ-साथ पारंपरिक जनजातीय वेशभूषा और उनके लोक वाद्यों (संगीत उपकरणों) का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया, जिसने नाटक में एक नई जान फूंक दी। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व इस अनोखे फ्यूजन नाटक को हाल ही में रोमानिया में आयोजित ‘इंटरनेशनल शेक्सपियर फेस्टिवल’ में भारत का प्रतिनिधित्व करने का गौरव भी प्राप्त हुआ है। इन जनजातीय छात्रों ने खुद दो महीने तक रोमानिया में रहकर कड़ी मेहनत की और आधे-आधे घंटे का यह विशेष फ्यूजन नाटक तैयार और निर्देशित किया।
