Bareilly : राज्यपाल ने बरेली कॉलेज प्राचार्य मामले में कुलपति के फैसले पर लगाई मुहर

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Published By Pradeep Kumar
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प्रबंधन का निर्णय अवैध घोषित, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केपी सिंह के आदेश की पुष्टि

बरेली, अमृत विचार। उच्च शिक्षा संस्थानों में शैक्षणिक स्वायत्तता और प्राचार्यों की गरिमा की रक्षा करते हुए राज्यपाल व कुलाधिपति ने बरेली कॉलेज के प्राचार्य प्रो. ओपी राय की परिवीक्षा अवधि बढ़ाने संबंधी प्रबंध समिति के निर्णय को अवैध ठहराया है। राज्यपाल ने एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केपी सिंह की तरफ से जारी वर्ष 2023 के आदेश की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया कि आयोग से चयनित प्राचार्यों की परिवीक्षा अवधि बढ़ाने का अधिकार प्रबंधन समितियों को नहीं है।

बरेली कॉलेज के प्राचार्य प्रो. ओपी राय से जुड़े मामले में राज्यपाल व कुलाधिपति के हालिया आदेश को उच्च शिक्षा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। अपने 11 जून के आदेश में राज्यपाल ने एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केपी सिंह के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें कॉलेज प्रबंध समिति द्वारा प्राचार्य की परिवीक्षा अवधि एक वर्ष बढ़ाने के निर्णय को निरस्त कर दिया गया था। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार आयोग द्वारा चयनित प्राचार्यों की नियुक्ति व परिवीक्षा से संबंधित नियम स्पष्ट हैं और किसी भी महाविद्यालय की प्रबंध समिति को उनकी परिवीक्षा अवधि बढ़ाने का अधिकार प्राप्त नहीं है। इसके बावजूद बरेली कॉलेज की प्रबंध समिति ने प्रो. ओपी राय की परिवीक्षा अवधि बढ़ाने का निर्णय लिया था, जिसे कुलपति ने 2 नवंबर 2023 को अवैध, मनमाना और नियमविरुद्ध बताते हुए निरस्त कर दिया था। मामले की अंतिम सुनवाई के बाद राज्यपाल ने कुलपति के आदेश को बरकरार रखते हुए विश्वविद्यालय के रुख को सही माना। इस फैसले को प्रदेश के आयोग-चयनित प्राचार्यों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

विश्वविद्यालय के अनुसार उत्तर प्रदेश में आयोग के माध्यम से नियुक्त लगभग 290 प्राचार्यों में से बड़ी संख्या प्रबंधन समितियों के साथ विवाद और दबाव के कारण पद छोड़ चुकी है। विश्वविद्यालय के विधिक प्रकोष्ठ प्रभारी प्रो. अमित सिंह ने कहा कि यह निर्णय पूरे प्रदेश के आयोग-चयनित प्राचार्यों के लिए ऐतिहासिक है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि प्रबंधन समितियां नियमों की अनदेखी कर स्वेच्छाचारिता नहीं कर सकतीं और प्राचार्यों को निष्पक्ष एवं स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार प्राप्त है। वहीं कुलपति प्रो. केपी सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय शैक्षणिक स्वायत्तता, नियमों के पालन और प्राचार्यों की गरिमा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल द्वारा विश्वविद्यालय के निर्णय की पुष्टि यह साबित करती है कि विश्वविद्यालय प्रशासन विधि और संविधान के अनुरूप काम करता है। उन्होंने आश्वस्त किया कि प्रबंधन की प्रताड़ना का सामना कर रहे प्राचार्यों के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन सदैव खड़ा है।

लगभग 40 से 50 प्रतिशत प्राचार्यों ने दिए इस्तीफे
गौरतलब है कि विगत वर्षों में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोग के माध्यम से लगभग 290 प्राचार्यों की भर्ती की गई थी। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इनमें से लगभग 40 से 50 प्रतिशत प्राचार्यों ने प्रबंधन समितियों की प्रताड़ना, दबाव और विभिन्न कारणों से अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह स्थिति अत्यंत गंभीर है क्योंकि आयोग कठोर परीक्षण एवं पारदर्शी प्रक्रिया के बाद योग्यतम अभ्यर्थियों का चयन करता है, लेकिन प्रबंधन समितियां प्रायः ऐसे स्वतंत्र एवं सक्षम प्राचार्यों को पसंद नहीं करतीं और अपनी मनमर्जी के "कठपुतली प्राचार्य" के माध्यम से संस्थानों का संचालन चाहती हैं।

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