कुकरैल में बनेगी देश की पहली नाइट सफारीः 5000 एकड़ का 'ऑक्सीजन हब' ऐसे बना पर्यटकों का पसंदीदा ठिकाना
शबाहत हुसैन विजेता, लखनऊ, अमृत विचार: राजधानी लखनऊ के कुकरैल जंगल में आने वाले दिनों में दुनिया की 5वीं और भारत की पहली नाइट सफारी बनाई जायेगी। सरकार ने बजट में इसके लिए 39 करोड़ रुपये का प्राविधान भी किया लेकिन कुछ पर्यावरण प्रेमियों के सुप्रीम कोर्ट चले जाने से यह मामला रुक गया। अदालत से हरी झंडी मिलने के बाद काम शुरू होगा। नाइट सफारी तैयार होने के बाद पर्यटकों के लिए लखनऊ में एक ऐसा ठिकाना तैयार होगा जिसमें लोग रात में भी घूम सकेंगे। खतरनाक माने जाने वाले जानवर लोगों को सामने टहलते दिखाई देंगे। मौजूदा समय में कुकरैल के जंगल में नीलगाय और हिरन देखने को मिलते हैं।
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फारेस्टर विवेक तिवारी ने बताया कि कुकरैल के जंगल में 200 से अधिक प्रजातियों के पक्षी आते हैं। जंगल से होकर गुजरने वाले कुकरैल नाले को फिर से नदी का स्वरूप दिया जा रहा है। पहले यह भी नदी थी लेकिन सीवर का पानी छोड़े जाने के बाद नदी नाले में बदल गई और लोग इसे कुकरैल नाला कहने लगे।
कुकरैल जंगल को पूरी तरह से छोड़ दिया गया प्रकृति पर
क्षेत्रीय वन अधिकारी कमलेश कुमार ने बताया कि कुकरैल के जंगल और आम जंगल में यह फर्क है कि इस जंगल में बगैर अनुमति के कोई नहीं जा सकता है। बिना अनुमति जंगल में घुसने वाले पर 20 हजार रुपये जुर्माना और दो साल की कैद हो सकती है। कुकरैल जंगल को पूरी तरह से प्रकृति पर छोड़ दिया गया है। प्रकृति जैसा चाहे वैसा उसे बनाए। इस जंगल में कोई सूखा पेड़ भी नहीं काट सकते। घास भी नहीं हटा सकते। यह माना जाता है कि सूखे पेड़ और घास में भी असंख्य जीवाश्म रहते हैं। उन्हें नुक्सान पहुंच सकता है।
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सड़क पर टहलते बंदर न काटते हैं न भागते
कुकरैल का जंगल 5000 एकड़ में फैला हुआ है। इस जंगल में कई तरह की बिल्लियां हैं, खरगोश हैं, मोर, तीतर, बटेर, तरह-तरह की चिडियां, तरह-तरह के सांप और लम्बर तोता, हीरामन तोता तथा टुइयां तोता देखने को मिलता है। बड़ी संख्या में बंदर भी इस जंगल में विचरण करते हुए मिल जाते हैं। जंगल में सड़क पर टहलते बंदर इंसान को देखकर न भागते हैं न झपटते हैं, इंसान को ही उनके लिए रास्ता छोड़कर आगे बढ़ना होता है। वो इस अंदाज में चलते नजर आते हैं कि जैसे उन्हें किसी का कोई डर न हो और वो अपने घर में टहल रहे हों।
घने जंगल में हैं तरह-तरह के पेड़
कुकरैल के जंगल में अर्जुन, यूकलेपटिस और चिलबिला के पेड़ों की लम्बी कतारें हैं। कुकरैल नदी के दोनों किनारों पर भी अर्जुन और चिलबिला के हजारों पेड़ हैं। शहर में बढ़ते प्रदूषण के दौर में कुकरैल आज भी ऑक्सीजन का सबसे शानदार केंद्र है। घने पेड़ों की तरफ मानसून भी आकर्षित होता है। पेड़ ज्यादा होते हैं तो वन्यजीवों का ठिकाना भी रहता है। पेड़ ज्यादा होते हैं तो स्वास्थ्य का खजाना भी हाजिर रहता है।
कभी ऊसर जमीन की वजह से तिरस्कृत इलाका था कुकरैल
लखनऊ में कुकरैल इलाका ऊसर में गिना जाता था। 1946 में अंग्रेजों ने इस ऊसर जमीन पर जंगल उगाकर दिखाया। ग्राम समाज से यह जमीन लेकर यहां जंगली बबूल लगाये गये। जंगली बबूल से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। जंगली बबूल लगे तो ऊसर जमीन हरियाली से लहलहा उठी।
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कुकरैल में अब तरह-तरह के पेड़ों की शानदार नर्सरी
कुकरैल के जंगल में एक हर्बल नर्सरी भी है। इस नर्सरी में घरों में पाई जाने वाली तुलसी, श्यामा तुलसी, रामा तुलसी, हरसिंगार, मीठी नीम, सर्पगंधा, बड़ी इलायची, आंवला, कचनार, अर्जुन, आम, अमरुद, अनार और मौसमी के पेड़ तैयार किये जाते हैं। यहां पर हड़जोड़ अरथी संहरी का पेड़ भी है। यह पेड़ टूटी हुई हड्डी को जोड़ने और नेत्र रोग में लाभकारी होता है। यहां पर शीशम, पापुलर, जामुन और यूकलेपटिस के पौधे भी तैयार किये जाते हैं। बड़ी इलायची का फूल किसी को भी आकर्षित कर सकता है।
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घड़ियाल और कछुआ प्रजनन केंद्र कुकरैल की ख़ास पहचान
घड़ियाल और कछुआ प्रजनन केंद्र के रूप में कुकरैल की ख़ास पहचान है। घड़ियाल और कछुआ प्रजनन केंद्र हालांकि बुन्देलखंड और बहराइच में भी हैं लेकिन कुकरैल केंद्र को नम्बर वन पर गिना जाता है। घड़ियाल प्रजनन केंद्र में एक इंच के घड़ियाल से लेकर विशाल घड़ियाल तक हैं। हर उम्र के घड़ियाल के लिए अलग-अलग तालाब बनाये गए हैं। उन्हें लोहे और शीशे की फैंसिंग से घेरा गया है। घड़ियाल के 60 से 80 दिन के बच्चे चम्बल और गेरुआ नदी में ले जाकर छोड़ दिए जाते हैं। नदियों में घड़ियाल छोड़े जाने से पानी में आक्सीजन की कमी पूरी हो जाती है। कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास और प्रजनन केंद्र 1975 में बनाया गया था। 10 हेक्टेयर क्षेत्र में बनाया गया यह केंद्र पर्यटकों के लिए सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र है।
नंबर वन ऐसे ही नहीं, घड़ियालों को यहां सहेजा गया
कुकरैल में घड़ियाल पुनर्वास और प्रजनन केंद्र बनाने की वजह यह थी कि उत्तर प्रदेश की नदियों से घड़ियाल लगभग गायब हो गये थे। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में बताया गया कि उत्तर प्रदेश की नदियों से घड़ियाल लुप्त हो रहे हैं और अब उनकी संख्या 300 के आसपास है। इस रिपोर्ट के बाद भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से उत्तर प्रदेश सरकार ने यह केंद्र शुरू किया। समय के साथ यह केंद्र घड़ियाल प्रजनन के मामले में नम्बर वन बन गया है। घड़ियाल प्रजनन केंद्र के ठीक सामने विशाल तालाब में कछुआ प्रजनन केंद्र है।
घड़ियाल पुनर्वास केंद्र में संग्रहालय भी आकर्षण का केंद्र
संग्रहालय में शेर, भालू, तेंदुआ विभिन्न प्रकार की बिल्लियां और अन्य लुप्तप्राय जानवरों की ममी सजाई गई हैं। संग्रहालय की 1988 से देखरेख करते आ रहे रामसजीवन बताते हैं कि 300 से ज्यादा लोग रोजाना संग्रहालय देखने आते हैं। संग्रहालय के आधे हिस्से में घड़ियाल और आधे में अन्य जानवरों को रखा गया है। संग्रहालय में घुसते ही सामने मुंह फाड़े शेर दिखाई पड़ता है। इस शेर को दिसम्बर 89 में कुकरैल से 400 मीटर की दूरी पर वन विभाग के शिकारियों ने मारा था। यह शेर 20 दिन तक लखनऊ शहर में आतंक का पर्याय बना रहा। यह शेर जंगल से शहरी क्षेत्र में आ गया था और लोगों की नींद हराम हो गई थी। इस संग्रहालय में कई शेर देखने को मिलते हैं। एक बिल्ली भी यहां है। आम बिल्लियों से काफी बड़ी यह बिल्ली भी लोगों के लिए ख़ास आकर्षण है। छोटा सा भालू भी चलते-चलते कदम रोक लेता है।
सारस और आकर्षक पक्षियों का किलोल खूब भाएगा
कुकरैल के जंगल में गड्ढों में भरे पानी में सारस और तरह-तरह के आकर्षक पक्षी पानी में किलोल करते नजर आते हैं। भीषण गर्मी की वजह से ज्यादातर गड्ढों का पानी सूख गया है। इस वजह से पक्षियों की संख्या कम हो गई है लेकिन जहां पानी है वहां पक्षी भी हैं।
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कुकरैल वन विभाग की प्रयोगशाला है : मोहम्मद अहसन
प्रदेश के पूर्व प्रमुख वन संरक्षक मोहम्मद अहसन बताते हैं कि कुकरैल वास्तव में एक जंगल नहीं बल्कि वन विभाग की एक शानदार प्रयोगशाला है। विशाल घने जंगल में एक अलग किस्म का सुकून है। उनका कहना है कि कुकरैल जंगल इसलिए ज्यादा ख़ास है क्योंकि यह शहरी क्षेत्र का जंगल है। शहरों में जब कांक्रीट के जंगल उग रहे हैं और सड़कों पर गाडियां बढ़ती जा रही हैं, हर तरफ शोर और धुएं का प्रदूषण है, उसमें इस जंगल में सन्नाटा है। साफ़-सुथरी हवा है। आसमान छूते पेड़ हैं। इस जंगल में बगैर किसी डर के घूमा जा सकता है क्योंकि खतरनाक जंगली जानवर यहां नहीं हैं। कभी-कभी नीलगाय अचानक से सामने आकर खड़ी हो जाती है लेकिन शेर, चीते जैसे जानवर यहां नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जिस दिन सरकार की नाइट सफारी योजना जमीन पर उतरेगी उस दिन पर्यटकों के लिए उत्तर प्रदेश का यह जंगल सबसे ज्यादा पसंदीदा जंगल बन जाएगा।
कुकरैल नाले से नदी में बदलने की जद्दोजहद
कुकरैल नदी में कुछ साल पहले तक वो लोग नहाने आते थे जिन्हें कुत्ता काट लेता था। ऐसी मान्यता थी कि कुत्ता काटने वाला अगर इस पानी में नहा ले तो वो ठीक हो जाता है, लेकिन वन अधिकारियों का कहना है कि कुत्ता काट ले तो डॉक्टर के पास जाना चाहिए, इस पानी में ऐसा कुछ नहीं है जो ठीक कर सके। नाले से नदी में बदलने की शुरू हुई कवायद से कुकरैल नाला जिस दिन भी साफ़-सुथरी नदी में बदल गया उस दिन यह इलाका लखनऊ के सबसे शानदार पर्यटन स्थल में बदल जाएगा। यह नाला कभी नदी ही था लेकिन सीवर का पानी गिरते-गिरते कब नदी बदबूदार नाले में बदल गई पता ही नहीं चला। जब इसका नाम ही कुकरैल नाला पड़ गया तब जिम्मेदारों की आंख खुली। तब समझ आया कि कुकरैल नदी ही होती तो कुकरैल जंगल में चार चांद लगा देती। कुछ साल से कुकरैल नाले को साफ़ करने और इससे जुड़े नालों को दूसरी ओर मोड़ने का काम शुरू हुआ है, तबसे यह उम्मीद जगी है कि समय लगेगा लेकिन कुकरैल नदी पुनर्जीवित होकर फिर से जीवनदायिनी नदी में बदलेगी।
कुकरैल नदी बख्शी के तालाब इलाके के अस्ती गांव के एक कुएं से निकली है। यह नदी लखनऊ की प्रमुख नदी गोमती में आकर मिल जाती है। शहरीकरण बढ़ा तो नदी में नाले गिरने लगे, लोग कचरा फेंकने लगे, जीवन देने वाली नदी कुछ ही दशकों में नाले में बदल गई। यह जाकर गोमती में मिली तो गोमती को पहले से ज्यादा प्रदूषित कर दिया। सरकार ने कुकरैल नदी को पुनर्जीवित करने की योजना तैयार की तो तमाम अतिक्रमण हटाये गए, नालों की टैपिंग की जा रही है, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाये जा रहे हैं, नालों का रुख मोड़ने की पहल हुई। सरकार ने नाले में बदल चुकी नदी को फिर से पुराने स्वरूप में लाने के लिए कमर कस ली तो काम तेज हो गया। समय लगेगा लेकिन उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में राजधानी में गोमती और कुकरैल नाम की दो साफ़ सुथरी नदियां यहां के नागरिकों को जीवन देने का काम करेंगी।
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उत्तर प्रदेश सरकार की योजना कुकरैल नदी को पुनर्जीवित कर यहां भी रिवर फ्रंट बनाने की है। नदी पुनर्जीवित हो जायेगी तो कुकरैल नदी के दोनों किनारों पर टहलने और साइकिल चलाने का एक अलग ही आनंद होगा क्योंकि यहां पार्श्व में कुकरैल जंगल के आसमान छूते पेड़ नजर आएंगे। एक तरफ पेड़ों की हरियाली सुकून देगी तो दूसरी तरफ जंगल से छनकर आती शुद्ध आक्सीजन फेफड़ों को आराम मुहैया करायेगी।
मोहम्मद अहसन, पूर्व प्रमुख वन संरक्षक उत्तर प्रदेश
सभी फोटो छायाकार राजकुमार वाजपेयी ने क्लिक की हैं
