बोधकथा : सबसे बड़ा धन
एक नगर में दो भाई रहते थे। बड़ा भाई बहुत धनी था, लेकिन अत्यंत कंजूस और अहंकारी। छोटा भाई साधारण किसान था, परंतु दयालु और संतोषी। गांव में जब भी कोई जरूरतमंद आता, छोटा भाई अपनी क्षमता के अनुसार उसकी मदद अवश्य करता। एक दिन दोनों भाई एक संत के पास पहुंचे और पूछा, “गुरुदेव, जीवन का सबसे बड़ा धन क्या है?” संत ने मुस्कुराकर दोनों को एक-एक मुट्ठी गेहूं दिया और कहा, “इसे संभालकर रखना, मैं एक वर्ष बाद लौटकर देखूंगा।”
बड़े भाई ने गेहूं को सोने की डिबिया में बंदकर तिजोरी में रख दिया। छोटे भाई ने वही गेहूं खेत में बो दिया। कुछ महीनों बाद उससे नई फसल तैयार हुई। उसने उसका कुछ हिस्सा जरूरतमंदों में बांट दिया और बाकी फिर से बो दिया। एक वर्ष बाद संत लौटे। बड़े भाई ने गर्व से तिजोरी खोली, लेकिन उसमें रखा गेहूं नमी के कारण सड़ चुका था। छोटे भाई ने संत को अनाज से भरे कई बोरे दिखाए और कहा, “गुरुदेव, यह उसी एक मुट्ठी गेहूं का फल है।”
संत बोले, “जो धन केवल अपने लिए बंद कर दिया जाता है, वह नष्ट हो जाता है, लेकिन जो धन परिश्रम, सेवा और सदुपयोग में लगाया जाता है, वह कई गुना बढ़कर लौटता है।” उस दिन बड़े भाई को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने भी जरूरतमंदों की सहायता करना शुरू कर दिया। कथा से सीख मिलती है कि धन की वास्तविक कीमत उसे संजोकर रखने में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग और परोपकार में है।
