दुनियाभर में कायम है शाहजहांपुर के कबूतरों की उड़ान का जलवा

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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शाहजहांपुर के अच्छी नस्ल के हरे कबूतरों की उड़ान का जलवा देश-दुनिया में कायम है। लंबी उड़ान के विशेषज्ञ कबूतर भारत के साथ पाकिस्तान में भी खूब पसंद किए जाते थे। जिले के कबूतरबाजों ने आजादी से पहले हरे कबूतरों की खास नस्ल तैयार की थी। इस नस्ल के कबूतरों की जबरदस्त मांग पाकिस्तान के कराची और लाहौर तक रहती थी। काली आंखों और शानदार उड़ान के कारण शाहजहांपुरी कबूतरों की खास पहचान है। शाहजहांपुरी हरे कबूतरों का क्रेज पूरे भारत में होने वाली कबूतरबाजी प्रतियोगिताओं में दिखता था।

जिले के पुराने कबूतर बाज महबूब उल्ला खां बताते हैं कि एक समय था, जब शाहजहांपुर में तैयार हरे कबूतरों की नस्ल देश-दुनिया में न सिर्फ मशहूर थी, बल्कि इसकी बहुत ज्यादा मांग थी। देश और विदेश से कबूतरबाजी के शौकीन शाहजहांपुर आकर हरे कबूतर खरीदकर अपने शौक को पूरा करते थे। वह बताते हैं कि उनके वालिद मंजूर उल्ला खां भी एक नामी कबूतरबाज थे। उनका नाम शाहजहांपुर से दिल्ली, गोरखपुर और कोलकाता तक मशहूर था। इन शहरों के नामी बड़े कबूतरबाज शाहजहांपुर में उनके घर आकर ठहरते थे और हरे कबूतरों की मांग रखते थे। उनके पिता के पास अच्छी नस्ल के हरे कबूतर होते थे। वह हरे कबूतरों की नस्ल के विशेषज्ञ माने जाते थे। वह कबूतरों की ब्रीड तैयार करते थे। किसी जमाने में जब पाकिस्तान के कराची और लाहौर से लोग यहां आते थे या भारत के लोग पाकिस्तान जाते थे तो हरे कबूतरों को पालने वालों से मिलकर उनसे कबूतरों की डिमांड रखते थे। वह बताते हैं कि हरे कबूतरों की नस्ल बहुत मजबूत और उड़ान वाली मानी जाती थी। जब कबूतर ले जाने पर पाबंदी लग गई तो लोग कबूतरों के अंडे ले जाते थे और उनसे हरे कबूतर प्राप्त करते थे। हरे कबूतरों को उड़ान प्रतियोगिताओं में शामिल किया जाता था। जानकार बताते हैं कि पाकिस्तान से हरे कबूतरों की नस्ल को कुछ शौकीन अपने साथ अमेरिका तक ले गए।

महबूब उल्ला खां ने बताया कि हरे कबूतर को इसलिए लोग ज्यादा पसंद करते थे कि वह बहुत शान वाले होते थे। जिस घर से उड़ान भरते थे, वहीं वापस लौटते थे। कई-कई दिन और कई-कई सप्ताह बाद वह अपने उड़े हुए स्थान पर वापस आने के लिए जान की बाजी लगा देते थे। 

नामचीन हस्तियां कबूतर लेने आती थीं शाहजहांपुर 

महबूब उल्ला खां बताते हैं, गोरखपुर से सेठ पुरूषोत्तम दास कार से अपने नौकर के साथ कबूतर लेने शाहजहांपुर आते थे। एमनजई जलाल नगर में मंजूर उल्ला खां के घर में ठहरते थे  और अपनी पसंद के हरे कबूतर लेकर जाते थे। मंजूर उल्ला खां कभी भी कबूतरों को बेचते नहीं थे। वह अपने मिलने जुलने वालों को तोहफे में कबूतर दे दिया करते थे। महबूब उल्ला खां बताया कि भारत के पूर्व मंत्री एचएम पटेल की बेटी अमृत पटेल को कबूतरबाजी का बहुत शौक था। वह कई बार शाहजहांपुर में उनके घर आकर हरे कबूतरों के कई जोड़े अपने साथ दिल्ली ले गई। अलीगढ़ के नीरज माहेश्वरी और लखनऊ के कर्नल कमल सिंह भी उनके घर से हरे कबूतरों के कई जोड़े अपने साथ ले गए। इतना ही नहीं उनके कबूतर कोलकाता के भी कई लोगअपने साथ ले गए। वह बताते हैं कि उनके वालिद का नाम कबूतर बाजी की दुनिया में दूर-दूर तक मशहूर था।  गोरखपुर, कोलकाता, दिल्ली, अलीगढ़, मलिहाबाद, लखनऊ, इलाहाबाद और बनारस आदि से आने वाले शौकीन अपने साथ हरे कबूतर ले जाते थे। 

टूर्नामेंट में उड़ान के लिए होता है हरे कबूतरों का इस्तेमाल 

कबूतरबाजी टूर्नामेंट में उड़ान के लिए इन हरे कबूतरों का इस्तेमाल किया जाता है। उत्तर प्रदेश के रामपुर में मशहूर कबूतरबाज दलबीर सिंह ऑल इंडिया टूर्नामेंट् कराते थे। इसमें रामपुर, शाहजहांपुर, कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, मलिहाबाद, बरेली, संभल आदि के कबूतरबाज शामिल होते थे और अपने हरे कबूतर उड़ाते थे। जीतने पर चैंपियनों को इनाम में ट्रॉफी, शील्ड और सर्टिफिकेट दिए जाते थे। 

यह है शाहजहांपुर के पुराने नामी कबूतरबाज 

जिले के नामी कबूतरबाजों में मंजूर उल्ला खां, इसरार बांधो वाले, अबरार खां, अहद उल्लाह खां, सआदत उल्लाह खां, मलिक मोहम्मद रफ़ी खां, रफीक उल्ला खां, अखलाक हुसैन खां, मलक छप्पा खां, जाहिद हसन खां, तहव्वर अली खां, इरशाद अहमद खां आदि थे। कभी कबूतरबाजी में इनकी तूती बोलती थी। 

महंगा शौक है कबूतरबाजी 

कबूतरबाजी का शौक काफी महंगा शौक है। कबूतरों की देखभाल, उनके रहने, खाने पीने का इंतजाम आदि में काफी पैसा खर्च होता है। इनको अच्छे खुराक दी जाती है। बीमार पड़ने पर इनका उपचार भी कराया जाता है। हबीब उल्लाह खां बताते हैं कि वह कबूतरों को पटेरी, बाजरा, अकरा, सरसों, चने, गेहूं आदि खाने को देते हैं। जब उड़ान प्रतियोगिता होती है तो कबूतरों की खुराक भी बढ़ाई जाती है। उन दिनों में कबूतरों को बादाम, पिस्ता, देसी घी की रोटी, मेवे का हलवा आदि खाने को दिया जाता है, ताकि टूर्नामेंट जीतने के लिए कबूतर किसी तरह कमजोर न पड़े। 

बीटेक इन कंप्यूटर साइंस कर चुके दानिश उल्ला खां को कबूतरों के बीच रहना पसंद है। वह उनके खाने-पीने दवा आदि का खास ख्याल रखते हैं। वह बताते हैं कि कबूतरों में रानीखेत, आई फ्लू, लकवा, बुखार, सुखा, चेचक, कोल्ड आदि बीमारियां हो जाती हैं। जिनसे अक्सर कबूतर मर तक जाते हैं। वह इन कबूतरों का अच्छा इलाज भी कराते हैं।

पाकिस्तान ले गए कबूतर के जोड़े

तारीन टिकली में रहने वाले कांग्रेसी नेता तसनीम अली खां ने बताया कि उनके दादा असगर अली खां अपने जमाने के बड़े कबूतरबाज थे। उनके मिलने वाले जब पाकिस्तान से आते थे तो वह हरे कबूतरों की मांग जरूर रखते थे। यहां के हरे कबूतर कई बार लोग पाकिस्तान ले गए। सन 1957 या 58 के आसपास पाकिस्तान के एक शौकीन उनके घर आए तो उन्होंने हरे कबूतरों की मांग रखी, लेकिन उनके दादा ने कबूतरों का जोड़ा देने से मना कर दिया तो उन्होंने दादा की गैर मौजूदगी में चुपके से कबूतरों का जोड़ा निकाल लिया और अपने साथ पाकिस्तान ले गए। साल भर तक उन्हें वहां रखा। एक साल बाद जब कबूतर किसी तरह छूटे  तो वह वापस भारत में अपने घर लौट आए। हरे कबूतरों की यही खास पहचान है। 

छह प्रकार के हैं हरे कबूतर

महबूब उल्ला ने बताया कि हरे कबूतरों की नस्ल में छह प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें चांदी वाले, गहरे नीम वाले, सरोचे वाले, बाबू वाले, डोरे वाले खुले और मोहम्मदी वाले खुले आदि कबूतर हैं। हर शौकीन की अपनी अलग पसंद है।


 -राशिद हुसैन जुगनु, शाहजहांपुर