Shravasti News : सावन में पेड़ों से गायब हुए झूले, हाथों की मेंहदी का रंग भी पड़ा फीका, अब मोबाइल की स्क्रीन में सिमट रही लोक परंपरा

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कजरी के गीत, सखियों की टोली व झूलों की मस्ती बनी याद

Shravasti News: मोबाइल और आधुनिक जीवनशैली के दौर में गांवों से सावन के पारंपरिक झूले, कजरी और मेंहदी की सामूहिक परंपरा सिमट रही है। जानिए कैसे बदल गया सावन का रंग।

शांति स्वरूप पाण्डेय, श्रावस्ती, अमृत विचार: कभी सावन का मतलब ही झूला हुआ करता था। सावन का नाम आते ही कभी गांवों की तस्वीर बदल जाती थी। आम, नीम और बरगद के पेड़ों की मजबूत डालियों पर रस्सी के झूले पड़ते थे। झूले पर बैठकर युवतियां और महिलाएं सावन के गीत गातीं, सहेलियों के साथ हंसी-मजाक करतीं और घंटों सावन की मस्ती में डूबी रहती थीं।

बच्चे भी झूले के लिए अपनी बारी का इंतजार करते थे। गांव की चौपाल से लेकर घरों के आंगन तक सावन की रौनक दिखाई देती थी। आज वह झूले गांवों से गायब हो चुके हैं। अब बच्चों को अकेले ही झूला झूलते देखा जा रहा है। यह कहना है अलक्षेन्द्र इंटर कॉलेज भिनगा के पूर्व भूगोल प्रवक्ता केशवराम पांडेय का। जो सावन के बदलते मौसम व परम्परा को चिंताजनक बताते है।

अब सुनाई नहीं देती कजरी 

भिनगा के बागुरैया निवासी पूर्व सूबेदार मेजर तुमुल कुमार पांडेय कहते है कि सावन और कजरी का रिश्ता सदियों पुराना है। बारिश की बूंदों के बीच जब महिलाओं की टोली कजरी गाती थी तो पूरा गांव लोक संस्कृति की मिठास में डूब जाता था। गीतों में मायके की याद, साजन का इंतजार, प्रेम और विरह की भावनाएं झलकती थीं। पहले शाम होते ही गांव की महिलाएं एक जगह जुटती थीं और देर रात तक कजरी गाती थीं। अब मोबाइल, टीवी और बदलती जीवनशैली के बीच कजरी की वह सामूहिक परंपरा भी हम ही चुकी है। लोकगीत अब घर-घर की आवाज नहीं, बल्कि मंचों और कार्यक्रमों तक सीमित होते जा रहे हैं।

हाथों की मेंहदी बता रही बदलाव की कहानी

पूर्व प्रधान शिक्षक पंकज देव मिश्र बताते है कि सावन में मेंहदी लगाना कभी महिलाओं और युवतियों के लिए खास उत्सव हुआ करता था। सखियां एक-दूसरे के हाथों में मेंहदी लगाती थीं। किसी की हथेली पर फूल बनते तो किसी के हाथों में बेल-पत्तियों की डिजाइन सजती थी। मेंहदी के बहाने घंटों बातचीत, हंसी-मजाक और गीतों का दौर चलता था। अब बाजार में तैयार मेंहदी और आधुनिक डिजाइन तो आसानी से मिल जाती हैं, लेकिन सखियों की टोली में बैठकर हाथों में मेंहदी रचाने की वह आत्मीयता कम होती जा रही है। सावन आता है, मगर पहले जैसी मेंहदी की रंगत हाथों पर नजर नहीं आती।

मोबाइल व आधुनिक जीवनशैली ने बदला सावन

समाजसेवी आलोक मिश्रा ओम बताते है कि समय के साथ गांवों की जीवनशैली भी तेजी से बदली है। मनोरंजन के नए साधनों ने पुराने तौर-तरीकों की जगह ले ली है। पहले खाली समय पेड़ के नीचे झूला झूलने और गीत गाने में बीतता था, अब वही समय मोबाइल की स्क्रीन पर बीत रहा है। सोशल मीडिया पर सावन की रील और वीडियो जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन गांव की वास्तविक गलियों में झूले कम दिखाई देते हैं। इसके साथ ही पुराने पेड़ों की कमी ने भी इस परंपरा को प्रभावित किया है। पेड़ घटे तो झूले भी कम हो गए।

लौटाना होगा सावन का पुराना रंग

पूर्व प्रधान शिक्षक रामउदार शुक्ला बताते है कि आज भी अपने बचपन के सावन को याद कर भावुक हो जाते हैं। उनका कहना है कि पहले सावन केवल बारिश का महीना नहीं था, बल्कि मिलन, गीत, झूले और रिश्तों की मिठास का पर्व था। जरूरत है कि आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते हुए हम अपनी लोक परंपराओं को भी बचाएं। गांवों में सावन झूला उत्सव, कजरी गायन और मेंहदी कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।

अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएं और उन पर पारंपरिक झूले डाले जाएं, ताकि नई पीढ़ी भी इस संस्कृति को महसूस कर सके। सावन की असली खूबसूरती सिर्फ बादलों और बारिश में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में थी जो झूले की एक रस्सी से जुड़ जाते थे। जरूरत है कि पेड़ों पर फिर झूले पड़ें, हाथों में फिर मेंहदी रचे और गांव की गलियों में फिर कजरी की आवाज गूंजे। तभी लौटेगा सावन अपने पुराने रंग में।

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