मिट्टी में धड़कती संस्कृति : मूर्तिकार सुनील की कला-यात्रा
कला मनुष्य की उन दुर्लभ उपलब्धियों में है, जो समय को पराजित कर देती हैं। शब्द इतिहास लिखते हैं, लेकिन मूर्तियां इतिहास को दृश्य रूप देती हैं। मिट्टी, पत्थर, लकड़ी और धातु जब कलाकार के हाथों में पहुंचते हैं तो वे केवल पदार्थ नहीं रह जाते, बल्कि स्मृतियों, भावनाओं और संस्कृति के जीवंत दस्तावेज बन जाते हैं। भारतीय सभ्यता का इतिहास भी उसकी मूर्तिकला के बिना अधूरा है। सिंधु घाटी की कांस्य नर्तकी से लेकर मौर्यकालीन शिल्प, अजंता-एलोरा, खजुराहो, कोणार्क और आदिवासी लोकशिल्प तक, हर युग ने अपनी चेतना को कला में रूपायित किया है। इसी समृद्ध परंपरा के समकालीन प्रतिनिधियों में झारखंड के चाईबासा के मूर्तिकार सुनील कुमार का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।
सुनील कुमार की कला किसी कृत्रिम बौद्धिक प्रदर्शन की नहीं, बल्कि जीवन के साथ गहरे संवाद की कला है। उनकी मूर्तियों में अनावश्यक आडंबर नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सादगी, लोकजीवन की लय, प्रकृति की आत्मीयता, पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना सहज रूप से दिखाई देती है। दर्शक उनकी मूर्तियों को केवल देखता नहीं, बल्कि उनमें छिपी कथा और संवेदना को महसूस करता है।
उनकी कला-यात्रा विरासत, संघर्ष और साधना का सुंदर संगम है। उनके पिता स्वर्गीय हरिहर प्रसाद और बड़े भाई स्वर्गीय अंबिका प्रसाद चाईबासा के प्रतिष्ठित मूर्तिकार थे। घर का वातावरण ही उनका पहला कला विद्यालय था। बचपन मिट्टी की सोंधी गंध, छैनी-हथौड़ी की लय और आकार ग्रहण करती मूर्तियों के बीच बीता। उन्होंने देखा कि कलाकार के स्पर्श से निर्जीव मिट्टी किस तरह जीवंत हो उठती है। यहीं से उनके भीतर कला के प्रति अनुराग जन्मा।
हालांकि उन्होंने पारिवारिक परंपरा तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। अपनी स्वतंत्र कलाभाषा की तलाश में वर्ष 1991 में वे चाईबासा से पटना पहुंचे और कला एवं शिल्प महाविद्यालय में प्रवेश लिया। संसाधन सीमित थे, जीवन संघर्षपूर्ण था और भविष्य अनिश्चित, लेकिन उन्होंने कठिनाइयों को राह का अवरोध नहीं बनने दिया। वर्ष 1996 में उन्होंने मूर्तिकला में बी.एफ.ए. किया और बाद में कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा से मूर्तिकला में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। इस प्रशिक्षण ने उनकी सहज प्रतिभा को तकनीकी अनुशासन, वैचारिक गहराई और सौंदर्यबोध प्रदान किया।
सुनील कुमार की कला का सबसे बड़ा गुण परंपरा और आधुनिकता के बीच दिखाई देने वाला संवाद है। वे लोकशिल्प को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनने देते, बल्कि उसे समकालीन संवेदनाओं से जोड़ते हैं। उनकी कृतियां अपनी मिट्टी से जुड़ी होने के बावजूद व्यापक मानवीय अनुभव का हिस्सा बन जाती हैं। उनकी कला में बाजार की चमक-दमक के बजाय जीवन की सादगी और जनजीवन की धड़कन दिखाई देती है।
टेराकोटा उनका प्रिय माध्यम रहा है। भारतीय कला परंपरा में मिट्टी केवल शिल्प सामग्री नहीं, बल्कि सृजन का आदिम तत्व है। सुनील कुमार के लिए मिट्टी मनुष्य, प्रकृति और संस्कृति के बीच संवाद का माध्यम है। उनकी कोशिश रहती है कि मूर्तियां ऐसी हों जिन्हें कुम्हार के चाक पर भी निर्मित किया जा सके और जो संरचनात्मक रूप से मजबूत तथा संतुलित हों। इस दृष्टि से उनकी कला भारतीय लोकशिल्प की उस परंपरा से जुड़ती है, जिसमें कला और जीवन के बीच कोई दूरी नहीं होती।
उनकी कृतियों में ‘कृष्ण’, ‘राधा-कृष्ण’, ‘आज़ादी’, ‘आदिवासी’, ‘माँ-बच्चा’, ‘पिता-पुत्र’, ‘सेल्फी’ और ‘छठ’ जैसे विषय प्रमुख हैं। इन विविध विषयों के केंद्र में मनुष्य और उसके संबंधों की कथा है। ‘कृष्ण’ श्रृंखला में प्रेम, करुणा और सौंदर्य का मानवीय रूप दिखाई देता है, जबकि ‘राधा-कृष्ण’ की कृतियां प्रेम, विश्वास, समर्पण और आत्मिक एकत्व की अनुभूति कराती हैं। ‘आज़ादी’ स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना की मुक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है।
उनकी ‘आदिवासी’ श्रृंखला उनकी कला की आत्मा कही जा सकती है। चाईबासा और झारखंड की धरती पर पले-बढ़े होने के कारण उन्होंने आदिवासी जीवन को बाहर से नहीं, आत्मीय दृष्टि से देखा है। उनकी मूर्तियों में आदिवासी समाज किसी रोमांचक दृश्य की तरह नहीं, बल्कि सम्मान और गरिमा के साथ उपस्थित होता है। जंगल वहां केवल पृष्ठभूमि नहीं, जीवन का सहभागी है; श्रम केवल जीविका नहीं, उत्सव है और समुदाय साझा अस्तित्व का आधार है। पारंपरिक वेशभूषा, सामूहिक नृत्य, सहज मुस्कान और प्रकृति से गहरा रिश्ता उनकी कृतियों में जीवंत हो उठता है। ‘सेल्फी’ आधुनिक तकनीक और आदिवासी जीवन के बदलते संबंधों पर सूक्ष्म टिप्पणी है, जबकि ‘छठ’ की कृतियां लोकआस्था, श्रद्धा और सामूहिक चेतना की गरिमा को अभिव्यक्त करती हैं।
उनकी शिल्प-भाषा का सबसे बड़ा गुण संयम है। वे अनावश्यक अलंकरण या दृश्य चमत्कार के पीछे नहीं भागते। संतुलित अनुपात, सहज भाव-भंगिमाओं और सीमित रेखाओं के माध्यम से गहरी भावाभिव्यक्ति रचते हैं। उनकी मूर्तियां दर्शक को चौंकाती नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उसके भीतर उतरती हैं। यही उनकी कला की शक्ति है कि वह शोर नहीं करती, लेकिन लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती है।
मूर्तिकला के साथ चित्रकला भी उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम है। वे जलरंग, टेंपरा, कंपोजिशन, स्थिर चित्रण और विशेष रूप से पोर्ट्रेट कला में दक्ष हैं। उनके पोर्ट्रेट केवल चेहरे की प्रतिकृति नहीं होते, बल्कि व्यक्ति के मनोभाव और आंतरिक ऊर्जा को भी अभिव्यक्त करते हैं। समय के साथ उनकी कला टेराकोटा से फाइबर तक पहुंची, जिससे आकार, विस्तार और स्थायित्व की नई संभावनाएं खुलीं, लेकिन माध्यम बदलने के बावजूद उनकी मूल कलाचेतना नहीं बदली।
वर्ष 2018 से 2025 के बीच दिल्ली, भोपाल, पटना, चंडीगढ़, जालंधर और अमृतसर सहित अनेक शहरों की एकल और सामूहिक प्रदर्शनियों में उनकी कृतियों ने कला-जगत का ध्यान आकर्षित किया। इन प्रदर्शनियों ने उन्हें एक विशिष्ट मूर्तिकार के रूप में पहचान दिलाने के साथ यह भी प्रमाणित किया कि भारतीय लोकजीवन और आदिवासी संस्कृति पर आधारित कला राष्ट्रीय कला-विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
सुनील कुमार मानते हैं कि कलाकार का सबसे बड़ा पुरस्कार सम्मान, पदक या प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि सृजन की प्रक्रिया से मिलने वाला आत्मिक आनंद है। यही विचार उनके रचनात्मक व्यक्तित्व की आधारशिला है। वे लोकप्रियता की क्षणभंगुर चमक से अधिक निरंतर सृजन को महत्व देते हैं। आज जब कला का एक बड़ा हिस्सा बाजार और प्रदर्शन की संस्कृति से प्रभावित है, उनका संसार एक अलग संभावना प्रस्तुत करता है। वे अपनी मूर्तियों में लोकजीवन की स्मृतियों, आदिवासी संस्कृति की गरिमा और मनुष्य-प्रकृति के संबंधों को सुरक्षित रखते हैं।
चाईबासा की मिट्टी से निकला यह कलाकार आज भारतीय कला-जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है। उन्होंने सिद्ध किया है कि आधुनिक होना अपनी जड़ों से कट जाना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को नए समय की भाषा में अभिव्यक्त करना है। उनकी मूर्तियां याद दिलाती हैं कि सभ्यताएं केवल इमारतों और तकनीक से नहीं, बल्कि उन कलाकारों से भी जीवित रहती हैं, जो मिट्टी में मनुष्य का चेहरा, संस्कृति की आत्मा और समय की धड़कन सहेज लेते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उन्हें समकालीन भारतीय मूर्तिकला का एक विशिष्ट, विश्वसनीय और सम्मानित हस्ताक्षर बनाती है।
