राष्ट्रीय पर्माकल्चर सम्मेलन 2026 : उत्तर प्रदेश के किसानों ने दिखाई सतत कृषि की नई राह, बेंगलुरु में गूंजी UP की मिसाल

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वाराणसी-कानपुर के किसानों की कहनियां बताती हैं कैसे खेती को टिकाऊ बनाने में सहायक है पर्माकल्चर

बेंगलुरु: उत्तर प्रदेश में किसान अब प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर खेती के नए तरीके अपना रहे हैं। वाराणसी के मयंक सिंह और कानपुर की वर्षा अग्रवाल की कहानियां बताती हैं कि पर्माकल्चर आधारित खेती किस तरह खेतों में सकारात्मक बदलाव ला रही है। इन किसानों की कहानियां 'राष्ट्रीय पर्माकल्चर सम्मेलन 2026' में साझा की गईं, जिसका आयोजन 22-23 अगस्त को आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर, बेंगलुरु में किया जा रहा है। सम्मेलन में देशभर के किसान, कृषि विशेषज्ञ, पर्माकल्चर विशेषज्ञ, उद्यमी और सामाजिक परिवर्तनकर्ता टिकाऊ कृषि के समाधान पर चर्चा कर रहे हैं।

श्री श्री रविशंकर ने बताया प्रकृति से जुड़ाव का महत्व

सम्मेलन का उद्घाटन आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर, कर्नाटक के सिंचाई मंत्री एन. चलुवराय स्वामी, अध्यक्ष नाबार्ड डॉ. शाजी कृष्णन, और प्रो. वंदना सिंह, कुलपति वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर की उपस्थिति में हुआ। अपने संबोधन में श्री श्री रविशंकर ने मानव और प्रकृति के बीच गहरे संबंध की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कृषि केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है। यह मिट्टी, जल, किसान, उपभोक्ता, बाजार, संस्थानों और मानव जीवन से जुड़ी एक संपूर्ण व्यवस्था है।

नाबार्ड अध्यक्ष बोले- प्रकृति के चक्रों से सीखने की जरूरत

नाबार्ड के अध्यक्ष डॉ. शाजी कृष्णन ने कहा कि पर्माकल्चर में बाहरी निर्भरता लगभग शून्य होती है, क्योंकि इसकी पूरी व्यवस्था प्रकृति के चक्रों पर आधारित होती है। हमें अपने हर कार्य में इस चक्रीय व्यवस्था को अपनाना चाहिए।

MAYANK
वाराणसी के मयंक सिंह
 
मयंक और वर्षा ने लिखी सफलता की इबारत

वाराणसी के मयंक सिंह और कानपुर की वर्षा अग्रवाल उन किसानों में शामिल हैं, जिन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग के पर्माकल्चर कार्यक्रमों से प्रशिक्षण लेकर पुनर्योजी कृषि के तरीकों को अपनाया है। कंप्यूटर साइंस स्नातक और पूर्व सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल मयंक ने महामारी के दौरान अपनी पैतृक भूमि पर खेती शुरू की। एक एकड़ से शुरू हुई उनकी यात्रा आज 2.5 एकड़ के ऐसे कृषि मॉडल में बदल चुकी है, जहां पर्माकल्चर और प्राकृतिक खेती के माध्यम से मिट्टी की गुणवत्ता, नमी संरक्षण और जैव विविधता में सुधार हुआ है। 

VARSHA
कानपुर की वर्षा अग्रवाल

 

कानपुर की वर्षा अग्रवाल ने परिवार के लिए रसायन मुक्त भोजन उगाने के प्रयास को एक टिकाऊ कृषि उद्यम में बदल दिया। उनका फार्म लगभग 50 परिवारों को उत्पाद उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने कृषि उत्पादों से मूल्यवर्धित वस्तुएं तैयार करने के साथ टिकाऊ पैकेजिंग के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका के अवसर भी बनाए हैं।

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