हमारे भोजन की पर्यावरणीय कीमत कौन चुका रहा है 

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Edited By Virendra Pandey
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यूरोप, कनाडा जैसे देशों में 'कार्बन टैक्स' को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रभावी आर्थिक हथियार के रूप में देखा जा रहा है। हाल में ब्रिटेन और इटली के शोधकर्ताओं ने खाद्य पदार्थों पर कार्बन टैक्स और कार्बन लेबलिंग को लेकर जो अध्ययन प्रकाशित किया है, उसने इस बहस को और तेज कर दिया है। अध्ययन का सार है कि यदि अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले खाद्य पदार्थों पर सीमित कर लगाया जाए और उनके साथ कार्बन लेबल भी लगाए जाएं, तो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

कुमार सिद्धार्थ
कुमार सिद्धार्थ,
वरिष्ठ पत्रकार

दुनिया जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए अब केवल पर्यावरणीय अपीलों पर निर्भर नहीं रहना चाहती। पिछले तीन दशकों में यह साफ हो गया है कि केवल लोगों से कम प्रदूषण करने की अपील करना पर्याप्त नहीं है, इसलिए अब जलवायु नीति का नया मंत्र है ‘प्रदूषण की भी एक कीमत होनी चाहिए।’ इसी सोच से निकला है 'कार्बन टैक्स'। आज यूरोप, कनाडा और कुछ अन्य देशों में 'कार्बन टैक्स' को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रभावी आर्थिक हथियार के रूप में देखा जा रहा है। हाल में ब्रिटेन और इटली के शोधकर्ताओं ने खाद्य पदार्थों पर कार्बन टैक्स और कार्बन लेबलिंग को लेकर जो अध्ययन प्रकाशित किया है, उसने इस बहस को और तेज कर दिया है। अध्ययन का सार है कि यदि अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले खाद्य पदार्थों पर सीमित कर लगाया जाए और उनके साथ कार्बन लेबल भी लगाए जाएं, तो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

कार्बन टैक्स यानी यदि कोई उद्योग, ईंधन या उत्पाद अधिक कार्बन उत्सर्जित करता है, तो उसे अधिक आर्थिक कीमत चुकानी होगी। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे  प्रदूषक भुगतान सिद्धांत कहा जाता है। उद्देश्य सरकार की आय बढ़ाना नहीं, बल्कि बाजार को यह संकेत देना है कि प्रदूषण अब मुफ्त नहीं रहेगा। जब अधिक प्रदूषण करने वाले उत्पाद महंगे होंगे, तो उद्योग स्वच्छ तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित होंगे और उपभोक्ता अपेक्षाकृत कम प्रदूषण वाले विकल्प चुनेंगे। जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि प्रदूषण फैलाने वाले की वास्तविक लागत समाज उठाता है। कोयला जलाने वाला उद्योग लाभ कमाता है, लेकिन प्रदूषित हवा का असर पूरा समाज झेलता है। बड़े पैमाने पर मांस उत्पादन करने वाली कंपनियां व्यापार करती हैं, लेकिन मीथेन गैस के कारण बढ़ते तापमान की कीमत पूरी दुनिया चुकाती है। कार्बन टैक्स इस असंतुलन को ठीक करने का प्रयास है।

ब्रिटेन के अध्ययन ने एक दिलचस्प तथ्य सामने रखे। शोधकर्ताओं ने पाया कि केवल कार्बन टैक्स से बेहतर परिणाम तब मिले, जब उसे कार्बन लेबलिंग के साथ जोड़ा गया। कार्बन लेबलिंग का अर्थ है कि किसी खाद्य उत्पाद पर यह जानकारी लिखी जाए कि उसके उत्पादन में कितना कार्बन उत्सर्जित हुआ है। यानी उपभोक्ता केवल कीमत नहीं, बल्कि पर्यावरणीय प्रभाव भी देख सके। इसका संदेश स्पष्ट है, जानकारी और आर्थिक संकेत, दोनों साथ हों तभी व्यवहार बदलता है। यूरोप में कार्बन टैक्स लागू करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन भारत जैसे देशों में स्थिति अलग है। यहां करोड़ों परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं। यदि खाद्य पदार्थों पर अतिरिक्त कर लगा दिया जाए, तो उसका सबसे अधिक असर गरीब परिवारों पर पड़ेगा। भारत ने अभी तक खाद्य पदार्थों पर कार्बन टैक्स की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है और निकट भविष्य में इसकी संभावना भी कम दिखाई देती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत के पास कोई विकल्प नहीं है।

पहला कदम कार्बन लेबलिंग हो सकता है। जिस तरह खाद्य पैकेटों पर पोषण संबंधी जानकारी दी जाती है, उसी तरह कार्बन फुटप्रिंट की जानकारी भी दी जा सकती है। दूसरा, सरकार उन किसानों और कंपनियों को प्रोत्साहन दे सकती है, जो कम कार्बन उत्सर्जन वाली खेती और खाद्य उत्पादन अपनाते हैं। तीसरा, सार्वजनिक खरीद, मिड-डे मील, आंगनबाड़ी और सरकारी पोषण योजनाओं में स्थानीय तथा कम कार्बन उत्सर्जन वाले खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह पहल भारत के लिए चुनौती के साथ अवसर भी बन सकती है। भारत के अधिकांश छोटे किसान अपेक्षाकृत कम कार्बन उत्सर्जन वाली कृषि करते हैं। मोटे अनाज, दालें, मिश्रित खेती और स्थानीय खाद्य प्रणालियां जलवायु की दृष्टि से अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती हैं। यदि भविष्य में वैश्विक बाजार कार्बन लेबलिंग को महत्व देता है, तो भारतीय कृषि को इससे प्रतिस्पर्धात्मक लाभ भी मिल सकता है, हालांकि इसके लिए विश्वसनीय मापन और प्रमाणन प्रणाली विकसित करनी होगी। 

इतिहास बताता है कि किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन का आधार केवल टैक्‍स नहीं होता। प्लास्टिक पर प्रतिबंध, ऊर्जा दक्षता, एलईडी बल्ब, सौर ऊर्जा और सार्वजनिक परिवहन इन सभी में कानून, प्रोत्साहन, तकनीक और जनजागरूकता ने मिलकर काम किया। इसके लिए उत्पादन की पद्धति बदलनी होगी, उपभोग की संस्कृति बदलनी होगी और सरकारों को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो पर्यावरण संरक्षण के साथ सामाजिक न्याय भी सुनिश्चित करें। कार्बन टैक्स कोई जादुई समाधान नहीं है, लेकिन यह बाजार को सही दिशा में मोड़ने का महत्वपूर्ण आर्थिक औजार बन सकता है। यदि इसे पारदर्शी नीति, कार्बन लेबलिंग, हरित प्रोत्साहनों और गरीब परिवारों की सुरक्षा के साथ लागू किया जाए, तो यह जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने में उपयोगी भूमिका निभा सकता है।

कार्बन टैक्स की चर्चा केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसका सीधा संबंध अर्थव्यवस्था, रोजगार और आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से भी है। किसी भी देश में जब प्रदूषण पर कीमत लगाई जाती है, तो उद्योगों के सामने दो रास्ते होते हैं— या तो वे अतिरिक्त लागत उपभोक्ताओं पर डालें या अपनी उत्पादन प्रक्रिया को कम प्रदूषण वाला बनाएं, इसलिए सरकार की जिम्मेदारी केवल टैक्स लगाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की भी है, जिसमें स्वच्छ तकनीक अपनाना कंपनियों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी हो। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह संतुलन और महत्वपूर्ण है। यहां ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है और बड़ी आबादी अभी भी सस्ती ऊर्जा तथा परिवहन पर निर्भर है। ऐसे में अचानक कठोर कार्बन टैक्स लागू करने के बजाय चरणबद्ध नीति अधिक व्यावहारिक हो सकती है। शुरुआत बड़े प्रदूषणकारी उद्योगों से की जा सकती है और धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ाया जा सकता है। साथ ही, स्वच्छ ऊर्जा पर सब्सिडी, सार्वजनिक परिवहन का विस्तार और ऊर्जा दक्ष तकनीकों को बढ़ावा देना जरूरी होगा।

अंततः जलवायु नीति की सफलता इस बात से तय होगी कि वह लोगों के जीवन को कठिन बनाए बिना उन्हें बेहतर विकल्प कितनी आसानी से उपलब्ध कराती है। कार्बन टैक्स तभी सफल होगा, जब वह दंड से अधिक बदलाव का माध्यम बने। जलवायु संकट का समाधान केवल प्रयोगशालाओं या संसदों में नहीं मिलेगा। भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न शायद यह नहीं होगा कि हम क्या खा रहे हैं, बल्कि यह होगा कि हमारे भोजन की पर्यावरणीय कीमत कौन चुका रहा है?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)