457 साल बाद बदल गया दुनिया का नक्शा, यूएन ने दी मंजूरी
असिस्टेंट प्रोफेसर,
मथुरा
स्कूल की दीवारों, किताबों, अखबार, टेलीविजन तथा इंटरनेट पर दुनिया का नक्शा देखते हुए हम शायद ही कभी यह सोचते हैं कि उसमें दिखाई देने वाली दुनिया और असली दुनिया एक ही चीज नहीं हैं। नक्शा हमें देशों की, जगह और आकार बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उस तस्वीर को बनाने वाले ने किन चीजों को सही रखने का फैसला किया और किन चीजों में विकृति स्वीकार की। गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर उतारने की प्रक्रिया में यह संभव ही नहीं कि हर चीज अपने वास्तविक रूप और अनुपात में दिखाई दे।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में अफ्रीकी देशों की पहल पर चार सितंबर को पारित ‘करैक्ट द मैप’ प्रस्ताव ने इस बहस को फिर अंतर्राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसे मानचित्रों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जिनमें अफ्रीका और दुनिया के दूसरे हिस्सों का क्षेत्रफल अधिक वास्तविक अनुपात में दिखाई दे। प्रस्ताव के पक्ष में 164 मत पड़े, एक मत विरोध में गया और छह देश मतदान से दूर रहे। यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है। यह न तो मर्केटर मानचित्र पर रोक लगाता है और न संयुक्त राष्ट्र ने किसी एक नए मानचित्र को दुनिया का अनिवार्य मानक बनाया है। प्रस्ताव का महत्व इस बात में है कि मानचित्र की तकनीकी बनावट को प्रतिनिधित्व और दृश्य असमानता के सवाल से जोड़ा गया है।
1569 में फ्लेमिश मानचित्रकार गेरार्डस मर्केटर ने जो प्रक्षेप बनाया था, उसका मकसद समुद्री यात्रियों के लिए दिशाओं को उपयोगी ढंग से दिखाना था। गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर उतारने की मजबूरी में उसने क्षेत्रफल की तुलना में दिशा को प्राथमिकता दी। समुद्री यात्रा के लिए यह एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक चुनाव था, लेकिन किसी चीज का मूल उद्देश्य और उसका बाद का इस्तेमाल हमेशा एक जैसा नहीं रहता। मर्केटर प्रक्षेप में भूमध्य रेखा से दूरी बढ़ने के साथ क्षेत्रफल की विकृति बढ़ती जाती है। ग्रीनलैंड और अफ्रीका इसका उदाहरण हैं। ग्रीनलैंड लगभग 21.7 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है, जबकि अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3.01 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से लगभग चौदह गुना बड़ा है। इसके बावजूद मर्केटर पर आधारित विश्व मानचित्र में दोनों का आकार पहली नजर में बहुत अलग नहीं लगता।
यही मानचित्र की तकनीकी सीमा सामाजिक अर्थ ग्रहण करने लगती है। नक्शा जमीन का आकार नहीं बदलता, लेकिन जमीन के आकार के बारे में हमारी पहली धारणा जरूर बना सकता है। किसी बच्चे को जब पहली बार दुनिया का नक्शा दिखाया जाता है, तो उसे आम तौर पर यह नहीं बताया जाता कि तस्वीर में दिशा, क्षेत्रफल और आकृति के बीच समझौते किए गए हैं। जो सामने है, वही दुनिया का स्वाभाविक रूप लगता है, इसलिए मर्केटर को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। अपने समय और उद्देश्य में उसकी उपयोगिता थी। प्रश्न तब पैदा होता है, जब समुद्री नौवहन के लिए उपयोगी वही प्रक्षेप महाद्वीपों के आकार की तुलना का माध्यम बन जाता है। वहां दिशा की शुद्धता से अधिक क्षेत्रफल का अनुपात महत्वपूर्ण हो सकता है। एक तकनीकी चुनाव को उसके उद्देश्य से अलग करके देखना ही उस भ्रम को जन्म देता है कि एक ही तस्वीर हर तरह की भौगोलिक सच्चाई को समान रूप से दिखा सकती है।
यूरोपीय साम्राज्यवाद मर्केटर मानचित्र की वजह से पैदा नहीं हुआ था, न मर्केटर ने यूरोप को राजनीतिक रूप से बड़ा बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन जिस दौर में यूरोपीय शक्तियां दुनिया के बड़े हिस्से पर राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व कायम कर रही थीं, उसी दौर में दुनिया को दिखाने वाली प्रचलित तस्वीरों में उत्तरी अक्षांशों के भूभाग भी अनुपातहीन रूप से बड़े दिखाई देते रहे। दोनों के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध निकालना गलत होगा, लेकिन उनके ऐतिहासिक सह-अस्तित्व को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
