‘आसमान में सुराख’ करने वाले दुष्यंत
साहित्यकार
दुष्यंत कुमार को हिंदी गजल का प्रवर्तक माना जाता है। वे हिंदी के पहले कवि हुए, जिन्होंने हिंदी में गजल लिखीं। उस समय उर्दू ग़ज़लों का बोलबाला था। दुष्यंत कुमार की आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई हिंदी गजलें पाठकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हुईं।
दुष्यंत कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में बिजनौर जिले की तहसील नजीबाबाद के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिंदी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ 42 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने बीए और हिंदी में एमए किया। उन्हें डॉ. धीरेंद्र वर्मा और डॉ. रामकुमार वर्मा का सानिध्य प्राप्त हुआ। कथाकार कमलेश्वर और मार्कण्डेय तथा कवि मित्रों धर्मवीर भारती, विजयदेव नारायण साही आदि के संपर्क से उनकी साहित्यिक अभिरुचि को नया आयाम मिला। मुरादाबाद से बीएड करने के बाद 1958 में आकाशवाणी दिल्ली में आए। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग के अंतर्गत भाषा विभाग में रहे। आपातकाल के समय उनका कविमन क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठा, जिसकी अभिव्यक्ति कुछ कालजयी ग़ज़लों के रूप में हुई, जो उनके ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' का हिस्सा बनीं।
30 दिसंबर 1975 की रात्रि में हृदयाघात से उनकी असमय मृत्यु हो गई। उन्हें मात्र 44 वर्ष की अल्पायु मिली। इस अल्प जीवन में उन्होंने अपनी कालजई रचनाओं के माध्यम से पाठकों के मध्य खासी लोकप्रियता और प्रसिद्धि अर्जित की। 1974 में उनका प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह साये में धूप' प्रकाशित हुआ। इसकी ग़ज़लों को इतनी लोकप्रियता हासिल हुई कि उसके कई शेर कहावतों और मुहावरों के तौर पर लोगों द्वारा व्यवहृत होते हैं। 52 ग़ज़लों की इस लघु पुस्तिका को युवा मन की गीता कहा जाए, तो अत्युक्ति नहीं होगी।
दुष्यंत कुमार के कुछ प्रमुख शेर...
यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैं ने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है
तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं
