हल्द्वानी: जै जिया जै जिया के उद्घोष से गूंजायमान होगा रानीबाग

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हल्द्वानी,अमृत विचार। रानीबाग में चित्रशिला घाट पर लगने वाले प्रसिद्ध जिया मेले का आयोजन उत्तरायणी पर किया जाएगा। 13 जनवरी को कत्यूर वंशज यहां आकर जिया रानी की पूजा कर जागर लगाएंगे और 14 तारीख की सुबह स्नान कर आशीर्वाद लेकर लौटेंगे। कोरोना महामारी को देखते हुए अभी प्रशासन की ओर से कोई गाइडलाइन जारी …

हल्द्वानी,अमृत विचार। रानीबाग में चित्रशिला घाट पर लगने वाले प्रसिद्ध जिया मेले का आयोजन उत्तरायणी पर किया जाएगा। 13 जनवरी को कत्यूर वंशज यहां आकर जिया रानी की पूजा कर जागर लगाएंगे और 14 तारीख की सुबह स्नान कर आशीर्वाद लेकर लौटेंगे। कोरोना महामारी को देखते हुए अभी प्रशासन की ओर से कोई गाइडलाइन जारी नहीं की गई है, लेकिन जियारानी मंदिर प्रबंधन की ओर से मेले की अंतिम तैयारियां की जा रही हैं।

बता दें कि यह मेला पूस माघ की आखिरी तिथि को लगता है। इस दिन पूरे राज्य भर से कत्यूर वंश के वंशज गाजे-बाजे के साथ रानीबाग आते हैं। इसके बाद गार्गी नदी के किनारे जियारानी की शिला पर धूप-दीप कर जागर लगाकर देवी को जागृत किया जाता है। इस मौके पर पूरा रानीबाग जै जिया जै जिया के उद्घोोष से गूंजायमान रहता है। हजारों की संख्या में यहां बच्चे, बूढ़े, जवान, महिला शामिल होती हैं। मंदिर के महंत व प्रबंधक नदंन गिरी गोस्वामी ने कहा कि मेले में आने वाले श्रद्धालुओं ने धर्मशालाओं की बुकिंग कर ली है। वहीं अन्य लोग भी परिसर में लगने वाले टैंट आदि के बारे में जानकारी ले रहे हैं। कोरोना को लेकर प्रशासन की गाइडलाइन का इंतजार किया जा रहा है। लेकिन मेले को लेकर भी तैयारी की जा रही है।

  • अपने-अपने तरीके से करते हैं आह्वान

जियारानी के मेले की खास बात यह है कि इसमें शामिल सभी कत्यूर वंश कुमाऊं और गढ़वाल के क्षेत्र से आते हैं। ऐसे में वंशज अलग-अलग जागर लगाकर जियारानी का आह्वाेन करते हैं। इन वंशजों के पूजा करने का तरीका भी अलग-अलग है। सभी के अपने-अपने वाद्य यंत्र होते हैं। इनमें हुड़का, मसकबीन, ढोल, दमवा, थाली का प्रयोग किया जाता है। पूरी रात आग की धूनी जली रहती हैं। धूनी जिनके किनारे पुरुष, महिला और बच्चे बैठे रहते हैं। इस मौके पर पुरुष सफेद रंग का कुर्ता, धोती और सिर पर कत्यूरी राजवंश के गर्व की प्रतीक सफेद रंग की पगड़ी पहने रहते हैं।

  • तड़के नदी में स्नान कर होती है पूजा संपन्न
    पूरी रात जागर के बाद सुबह की कड़ाके की ठंड के बावजूद लोग ब्रह्मुहूर्त गार्गी नदी में स्नान करते हैं। इसके बाद जिया रानी की शिला के दर्शन के बाद सभी अपने घरों को जाते हैं।

ये है कत्यूरी राजवंश की महारानी का इतिहास
कुमाऊं में कत्यूरी राजवंश चंद्र राजवंश से पहले का था। इतिहासकार इन्हें अयोध्या के सूर्यवंशी राजवंश शालीवान का संबंधी मानते हैं। 47वें कत्यूरी राजा प्रीतम देव की महारानी ही जियारानी थी। प्रीतम देव को पिथौराशाही नाम से भी जाना जाता है। जिनके नाम पर पिथौरागढ़ नगर का नाम पड़ा है। जियारानी का असल नाम मौला देवी थाष था, जो हरिद्वार के राजा अमर देव पुंडीर की दूसरी बेटी थी। अमर देव की पहली बेटी की शादी प्रीतम देव से हुई थी।

1398 में जब समरकंद का शासक तैमूर लंग मेरठ को लूटने के बाद हरिद्वार की ओर बढ़ रहा था, तब अमर देव ने राज्य की रक्षा के लिए प्रीतम देव से मदद मांगी। प्रीतम देव ने अपने भतीजे ब्रह्मदेव के नेतृत्व में विशाल सेना हरिद्वार भेजी, जिसने तैमूर की सेना को हरिद्वार आने से रोक दिया। इस दौरान ब्रह्मदेव की मुलाकात मौला देवी से हुई और वह उससे प्रेम करने लगा। अमर देव को यह पसंद नहीं आया। उसने मौला की मर्जी के खिलाफ उसकी शादी प्रीतम देव से कर दी। मौला देवी को विवाह स्वीकार नहीं था। कुछ दिन राजा के साथ चौखुटिया में रहने के बाद वह नाराज होकर रानीबाग एकांतवाश के लिए आ गईं। माना जाता है कि वो यहां 12 साल तक रहीं। उन्होंने एक छोटी टुकड़ी गठित की और यहां फलों का विशाल बाग लगाया।

इसी वजह से इस स्थल का नाम रानीबाग पड़ गया। कहा जाता है कि एक बार रानी गार्गी नदी में नहा रही थी। उसके लंबे सुनहरे बाल नदी में बहते हुए रोहिल्ला सिपाहियों को मिले। उन्होंने सुनहरे बाल वाली महिला की खोज शुरू की। उनकी नजर नहाते हुए रानी पर पड़ी। सैनिकों से बचने के लिए रानी पहाड़ी पर स्थित गुफा में छिप गई। रानी की सेना रोहिल्लों से हार गई और रानी को गिरफ्तार कर लिया गया। जब इसकी सूचना प्रीतम देव को मिली तो उसने अपनी सेना भेजकर रानी को छुड़ाया और अपने साथ ले गया। कुछ समय बाद प्रीतम देव का देहांत हो गया। उनका पुत्र दुला शाही बहुत छोटा था। इसलिए मौला देवी ने दुला शाही के संरक्षक के रूप में राज्य का शासन किया। पहाड़ में मां को जिया भी कहा जाता है। चूंकि मौला देवी राजमाता थीं, इसलिए वो जियारानी कहलाईं। रानीबाग में जियारानी की गुफा दर्शनीय है।

चित्रशिला का भी है विशेष महात्म्य
नदी के किनारे एक विचित्र रंग की शिला है। जिसे चित्रशिला कहा जाता है। कहा जाता है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव की शक्ति समाहित है। पुराणों के अनुसार नदी किनारे वट वृक्ष की छाया में मार्केण्डय ऋषि ने एक पांव पर खड़े होकर, दोनों हाथ ऊपर कर विष्णु ने विश्वकर्मा को बुलाकर इस शिला का निर्माण करवाया और उस पर बैठकर ऋषि को वरदान दिया। हालांकि कुछ लोग इस शिला को जियारानी का घाघरा भी कहते हैं।

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