बरेली: यह कैसा अस्पताल, 17 साल बीते, नहीं हुआ एक भी ऑपरेशन
सिद्धार्थ भारद्वाज, बरेली। शहर में स्पाइनल संबंधी बीमारियों के उपचार लिए पीलीभीत बाईपास रोड पर स्पाइनल इंजरी अस्पताल बनाया गया था। समाज कल्याण विभाग की ओर से केंद्र सरकार की योजना के तहत तैयार किया गया यह अस्पताल केंद्र और राज्य सरकार के बीच फंसकर अपने उदेश्यों की ही पूर्ति नहीं कर सका है। अपने …
सिद्धार्थ भारद्वाज, बरेली। शहर में स्पाइनल संबंधी बीमारियों के उपचार लिए पीलीभीत बाईपास रोड पर स्पाइनल इंजरी अस्पताल बनाया गया था। समाज कल्याण विभाग की ओर से केंद्र सरकार की योजना के तहत तैयार किया गया यह अस्पताल केंद्र और राज्य सरकार के बीच फंसकर अपने उदेश्यों की ही पूर्ति नहीं कर सका है। अपने ही खर्चों से चल रहा यह अस्पताल सिस्टम के कार्यों का आईना दिखाता है।
आम लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए सरकारें नित नई योजनाओं को लाती हैं। इसके तहत इन योजनाओं पर पानी की तरह बजट भी बहाया जाता है लेकिन कुछ ही योजनाएं धरातल पर साकार रूप ले पाती हैं, उनमें से भी बहुत कम ऐसी योजनाएं होती हैं। जिनका फायदा आम लोगों को मिल पाता है। सरकारी सिस्टम के ही कार्य का एक जीता जागता सबूत पीलीभीत बाईपास रोड पर 1250 वर्ग मीटर क्षेत्र में बना स्नाईनल सेंटर का भवन है।
इस सेंटर को 2004 में सपा सरकार के मुखिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उद्घाटन किया था। यह सेंटर समाज कल्याण विभाग की ओर से केंद्र सरकार के बजट से शुरू किया गया। इस अस्पताल का उदेश्य लोगों को कम पैसों में स्पाईनल व आर्थों संबंधी अन्य बीमारियों का बेहतर उपचार करने का था। इसके लिए अस्पताल में निदेशक से लेकर चिकित्सक, पैरामेडिकल स्टाफ आदि के पद भी बनाए, लेकिन आज तक यहां पर न तो चिकित्सक और न ही स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती हो सकी है।
अस्पताल शुरू हो जाने के बाद ही समाज कल्याण विभाग ने इससे अपने हाथ पीछे खींच लिए। समाज कल्याण विभाग के अनुसार अस्पताल का बजट राज्य सरकार के मद से आना प्रस्तावित है, जबकि आज तक किसी भी राज्य सरकार ने इस अस्पताल को बजट देना स्वीकार किया है। जिसके बाद अस्पताल बनकर तैयार हो गया शुरू भी हो गया, लेकिन आज तक यहां पर एक भी स्पाईनल का ऑपरेशन नहीं हो सका है।
अपने खर्चे पर चल रहा अस्पताल
अस्पताल के निदेशक और जिला अस्पताल के सीएमएस डा. सुबोध बताते हैं कि अस्पताल का महीने का खर्चा लगभग 2 लाख 80 हजार रुपए हैं, जबकि अस्पताल को महीने में लगभग 3 लाख रुपए होती है, ऐसे में अस्पताल के मेंटीनेंस व अन्य कार्यों के लिए अधिक राशि नहीं शेष रह पाती है। इसके साथ ही अब तक किसी से संबद्ध न होने के कारण इसको बजट भी नहीं मिल पाता है।
प्रतिदिन 70 से 80 मरीजों की है ओपीडी
निदेशक डा. सुबोध कुमार के मुताबिक स्पाईनल इंजरी सेंटर पर प्रतिदिन 70 से 80 मरीज आते है। उनको देखने के लिए सेवानिवृत्त हो चुके केवल एक ही आर्थोपेडिक सर्जन डा. संतोष गंगवार ही है। जो कुछ मानदेय पर अपनी सेवाएं दे रहे है। ऐसे में अगर वह किसी दिन अवकाश पर चले जाते हैं तो अस्पताल उस दिन बैठ जाता है।
केंद्रीय मंत्री भी कर चुके है प्रयास
केंद्रीय राज्य मंत्री संतोष गंगवार भी इस अस्पताल को राज्य कर्मचारी बीमा निगम की योजना से संबंद्ध किए जाने का प्रयास कर चुके हैं। लेकिन उन्हें भी आज तक अपने लिखे पत्र की प्रतीक्षा है।
2003 में स्थानांतरित हुआ था सेंटर
यह स्पाइनल इंजरी सेंटर पहले जिला अस्पताल में शुरू किया गया था, लेकिन जगह कम पड़ने पर पांच एकड़ भूमि उपलब्ध कराने की मांग प्रदेश सरकार से की गई। इसके लिए तलापुर गांव में मिली जमीन पर सेंटर को स्थानांतरित कर दिया गया। तब केंद्र सरकार ने इस सेंटर के लिए 86 लाख रुपए का बजट जारी किया था। जिसके बाद एक बार और केंद्र सरकार से 20 लाख रुपए का बजट जारी किया गया। इसके बाद इस अस्पताल को चलाने का बजट राज्य सरकार को करना था, लेकिन आज तक प्रदेश सरकार ने इस सेंटर के लिए कोई भी बजट जारी नहीं किया है।
मानदेय पर इस मद में पद पर है तैनात
एक आर्थोपेडिक सर्जन, पैथालॉजिस्ट, स्टेनो, लेखा लिपिक, फिजियोथेरेपिस्ट, नर्सिंग सहायक, नर्सिंग आर्दली लैब असिस्टेंट, शू मेकर, चार चतुर्थ श्रेणी, एक सुपरवाइजर माली, सफाई कर्मी और तीन सुरक्षा कर्मी।
इनकी है जरूरत
चिकित्सक, नर्स, वार्ड ब्वॉय, कर्मचारी, आधुनिक उपकरण, डिजीटल एक्सरे, एमआरआई मशीन, पैरालिसिस वार्ड, ऑपरेशन के लिए उपकरण आदि की जरूरत है।
“स्पाइनल इंजरी सेंटर तो अपनी कमाई से चल रहा है। चिकित्सक से लेकर कर्मचारियों तक को वेतन यहीं से मिलता है। एक सेवानिवृत्त चिकित्सक यहां पर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। किसी भी विभाग से संबद्ध न होने की वजह से अस्पताल को बजट ही नहीं मिल पाता है। आज भी उपकरण व अन्य चीजों की आवश्यकता है।” -डा.सुबोध, निदेशक, स्पाईनल इंजरी सेंटर
