अब समाधान जरूरी
गणतंत्र दिवस पर जिस तरह से किसान आंदोलन के बीच निकाली गई ट्रैक्टर रैली के दौरान बवाल को अंजाम दिया गया, वह हरकत शर्मिंदा करने वाली है लेकिन इसको अंजाम देने वाले खुराफातियों ने किसान आंदोलनकारियों को भी कानूनी दायरे में ला दिया। अब भारतीय किसान यूनियन टिकैत गुट ने कानूनी कार्रवाई के बहाने कृषि …
गणतंत्र दिवस पर जिस तरह से किसान आंदोलन के बीच निकाली गई ट्रैक्टर रैली के दौरान बवाल को अंजाम दिया गया, वह हरकत शर्मिंदा करने वाली है लेकिन इसको अंजाम देने वाले खुराफातियों ने किसान आंदोलनकारियों को भी कानूनी दायरे में ला दिया। अब भारतीय किसान यूनियन टिकैत गुट ने कानूनी कार्रवाई के बहाने कृषि बिल के मुद्दे को जिस तरह से फिर पुरजोर उठाया है, उससे सरकार की चिंता बढ़ गई है।
सवाल कृषि बिलों के मुद्दों को सुलझाने से ज्यादा कानून और व्यवस्था से जुड़ गया है। शुक्रवार को आंदोलन स्थल पर हुईं झड़पों ने चिंता और बढ़ा दी है। सरकार अपने रुख पर अड़ी है और आंदोलनकारी लगातार डटे हुए हैं लेकिन इस बढ़ते तनाव के बीच आम जनता की दिक्कतें और दुश्वारियां बढ़ती जा रही हैं।
राष्ट्रीय राजधानी में बवाल की स्थिति में उसका खमियाजा आम जनता को भुगतना होता है। पिछले दो महीने से जिस तरह से किसान आंदोलनकारी दिल्ली में जगह-जगह धरना-प्रदर्शन कर जमे हुए थे उससे आवागमन बाधित हुआ था। मंडी भी बंद चल रही थीं। इसका खमियाजा नि:संदेह किसानों को भी भुगतना पड़ रहा था। किसान आंदोलनकारी भले ही कृषि बिलों पर सरकार से किसी सार्थक बातचीत तक नहीं पहुंच पाए लेकिन जैसा कि अंदेशा था उनके बीच घुसे अराजकतत्वों ने माहौल जरूर खराब कर दिया। इससे कानूनी कार्रवाई का निशाना किसान संगठनों के नेता ही बने हैं।
सरकार को भी कानून व्यवस्था के मुद्दे पर जूझना पड़ रहा है। टकराव की नौबत आ गई है, वो अलग। जाहिर है कि आंदोलनकारियों और सरकार के मध्य संवादहीनता इसका कारण बनी। यदि किसान संगठनों के पदाधिकारी और सरकार के प्रतिनिधि बिलों पर असहमति वाले मुद्दों पर बातचीत करते तो शायद अराजकतत्वों को इतना मौका न मिला होगा। अभी भी मौका है। देर आए-दुरुस्त आए पर अमल करते हुए दोनों पक्षों को बातचीत का रास्ता जितना जल्दी हो निकालना चाहिए, तभी मुद्दों का हल संभव है।
दोराय नहीं कि टकराव की स्थिति किसी भी रूप में बाधित नहीं है। देश और जनहित में आंदोलनकारियों और सरकार, दोनों को ही संवाद का रास्ता निकालना होगा। अन्यथा की स्थिति में शरारती तत्वों को फिर मौका मिलते देर नहीं लगेगी। ऐसी स्थिति फिर न आने पाए, यह जिम्मेदारी किसी एक ही नहीं सबकी है।
