रुद्रपुर: अखबार बेचना शुरू किया तो बदल गई जिंदगी…
रुद्रपुर, अमृत विचार। “अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला, जिस दिये में जान होगी वो जलता रह जाएगा”…, महशर बदायुंनी का यह शेर रुद्रपुर के युवा अखबार वितरक विजय सागर पर एकदम सटीक बैठता है। विजय का जीवन जन्म से लेकर युवावस्था तक एक जुझारू व्यक्ति के संघर्ष की दास्तान है। सड़कों पर सोने …
रुद्रपुर, अमृत विचार। “अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला, जिस दिये में जान होगी वो जलता रह जाएगा”…, महशर बदायुंनी का यह शेर रुद्रपुर के युवा अखबार वितरक विजय सागर पर एकदम सटीक बैठता है। विजय का जीवन जन्म से लेकर युवावस्था तक एक जुझारू व्यक्ति के संघर्ष की दास्तान है। सड़कों पर सोने से लेकर होटल में सहायक का काम करने और आटा चक्की में मेहनत करने से लेकर चाय का ठेला लगाने तक विपन्न पृष्ठभूमि से आने वाले विजय का जीवन समस्याओं से भरा रहा, लेकिन आज अखबार वितरण को प्रमुख व्यवसाय बना चुके विजय अपनी पत्नी व चार बच्चों के साथ खुशमय जीवन बिता रहे हैं।
शहर की सुभाष कॉलोनी में डालचंद व नथिया सागर के घर 1981 में जन्मे विजय अपने परिवार के बड़े बेटे हैं। परिश्रमी विजय बाल्यकाल से ही अपने पिता के लघु व्यवसाय में हाथ बंटाने लगे थे। उनके ठेले पर साथ काम करते विजय जीवन की कठिनाइयों से रूबरू होते रहे। कुछ समय बाद आर्थिक समस्या आई तो माता-पिता अपने पैतृक गांव सिसौना जिला बरेली चले गए। मगर विजय ने रुद्रपुर रहकर ही कुछ करने की ठान रखी थी। उन्होंने शहर नहीं छोड़ा और काम करने का जूनून पाले रहे। कई बार सड़क पर रात गुजारनी पड़ी, मगर हौंसला नहीं टूटा। इसके बाद एक होटल में काम किया और गुजर-बसर होने लगी। आर्थिक परेशानी आती रही और इसके चलते होटल की नौकरी छोड़ एक आटा चक्की में काम शुरू कर दिया। इसी बीच साल 1996 में पिता का निधन हुआ तो विजय अपनी मां और छोटे भाई को गांव से रुद्रपुर ले आए। पंद्रह वर्षीय विजय के कंधों पर पुरे परिवार को पालने की जिम्मेदारी आ गई। चक्की का काम छोड़ विजय ने अपना चाय का ठेला लगाना शुरू किया। इसी दौरान किसी की सलाह पर विजय ने अखबार वितरण का काम शुरू कर दिया।
अल सुबह अखबार बांटने और उसके बाद अपना ठेला लगाते विजय की मेहनत अब रंग लाने लगी। अब परिवार का भरण-पोषण अपेक्षाकृत सरलता से होने लगा। विजय के भी समझ में आने लगा कि यदि आर्थिक स्वावलंबन की ओर बढ़ना है तो अखबार वितरण के कार्य को और व्यापक करना होगा। हिम्मत के धनी विजय ने अब अकेले ही नौ सौ अखबार बांटने शुरू कर दिए। सुभाष कॉलोनी में घर बनाया, छोटे भाई को समुचित शिक्षा दिलवाई और उसे भी अपने अखबार वितरण के कार्य से जोड़ लिया।
साल 2005 में अंबेडकर नगर हल्द्वानी की सुषमा के साथ विजय परिणय-सूत्र में बंध गए। घर में लक्ष्मी आने से काम भी बढ़ गया और विजय को संतति भी प्राप्त हुई। एक हंसते-खेलते परिवार के साथ विजय का जीवन खुशमय हो चला था। इसके बाद उन्होंने अपनी दूसरी जिम्मेदारी यानी कि अपने छोटे भाई अर्जुन का भी विवाह संपन्न कराया और उसे शहर के प्रतिष्ठित शोरूम में नौकरी भी दिलवा दी। यही नहीं विजय ने अपनी खुद की एक दूकान भी खोल ली। विजय कहते हैं कि उन्हें ईश्वर से कोई शिकायत नहीं है। भले ही उन्हें जीवन में अनेक संघर्ष करने पड़े, विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा मगर अखबार वितरण का कार्य शुरू करने के बाद उनका जीवन सुगम हो गया। उन्होंने कहा कि समाचार-पत्र उनके लिए स्वयं ईश्वर स्वरुप है और इसके जरिये सैकड़ों परिवार आज उन्हें जानते हैं व सम्मान देते हैं। लॉकडाउन के दौरान वितरण कम होने की बात स्वीकारते हैं मगर कहते हैं कि अपने जीवन में जो परेशानियां उन्होंने झेली हैं उनके समक्ष यह बहुत छोटी समस्या है और जल्द ही वह इससे पार पा लेंगे। मुस्कुराते हुए कहते हैं कि अखबार वितरण में एक बार फिर से शीर्ष पर पहुंचेंगे।
