महाभारत कालीन घटनाओं से जुड़ा है मनमोहक पांडवखोली
रानीखेत, अमृत विचार। देवभूमि उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्वविख्यात तो है ही, साथ ही यह देवों की तपोभूमि भी रही है। यहां कण-कण में आस्था, श्रद्धा, विश्वास का अटूट संगम दिखाई देता है। ऐसा ही एक मनमोहक, रमणीक स्थान है रानीखेत में बसा पांडवखोली। देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट नगर से …
रानीखेत, अमृत विचार। देवभूमि उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्वविख्यात तो है ही, साथ ही यह देवों की तपोभूमि भी रही है। यहां कण-कण में आस्था, श्रद्धा, विश्वास का अटूट संगम दिखाई देता है। ऐसा ही एक मनमोहक, रमणीक स्थान है रानीखेत में बसा पांडवखोली।
देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट नगर से लगभग बीस किलोमीटर दूरी पर बसा कुकुछिना नामक स्थान से खड़ी चढ़ाई पार करके ऊंची चोटी पर स्थित है महाभारत काल की घटनाओं को संजोये स्वर्गपुरी पांडवखोली। महाभारतकाल से जुड़ी घटनाओं एंव पाड़वों से जुड़ी हुई घटनाओं के कारण ही इस स्थान को पांडवखोली नाम से भी जाना जाता है। पांडव-खोली अर्थात पांडवों का निवास स्थान। महाभारत काल में पांडवों ने वनवास के दौरान इस स्थान पर भी निवास किया था। इस कारण इस स्थान को पांडवखोली नाम से जाना जाता है। ऊंची पहाड़ी पर विहंगम पांडवखोली घने जंगल से घिरा है।
एकांत दिव्य स्थल होने के कारण यहां ध्यात्म के साथ-साथ पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं हैं । खूबसूरत पांडवखोली क्षेत्र चारों ओर से मंदिरों के समूहों से भी घिरा है और इन मंदिरों में लोगों की गहरी आस्था है। पांडवखोली पहुंचने पर एक बुग्यालनुमा मैदान स्थित है जिसे भीम की गुदड़ी के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाताा है कि महाभारत काल में जब पांडव वनवास में पांडवखोली क्षेत्र में निवास करते थे तो महाबली भीम इसी मैदान में शयन करते थे, इसलिए इस मैदान को भीम की गुदड़ी के नाम से जाना जाता है। प्रकृति की सुंदरता का आनंद पांडवखोली की ऊंची चोटी से लेने के लिए दूर दूर से सैलानी, देशी-विदेशी पर्यटक यहां आते हैं। पांडवखोली से हिमालय की सुंदर श्रंखलाओं के दर्शन किए जा सकते हैं ।
सूर्योदय व सूर्यास्त का खूबसूरत दृश्य बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां स्थित महावतार बाबा गुफा, द्रोपदी विहार, भीम की गुदड़ी, ध्यान केन्द्र, सुंदर मंदिर परिसर मन को शांति प्रदान करने वाले हैं। महावतार बाबा की गुफा में लोग ध्यान और योग क्रियाएं करते हैं। पांडवखोली के पास भरतकोट, मनसादेवी, सुखादेवी, व आदिशक्ति मां दूनागिरी के मंदिर समूह हैं। इन्में श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है।
पांडवखोली में घने जंगल के बीच द्रोपदी विहार में एक टावर भी बनवाया गया है, जिसे ध्यान केन्द्र के रूप में जाना जाता है। मुख्य मंदिर के चारों ओर घनघोर वनों से घिरा है खुबसूरत पांडवखोली क्षेत्र। मंदिर परिसर में पांडवों की मूर्तियां भी है। पांडवखोली में हर वर्ष ब्रह्मलीन महंत बलवंत गिरी महाराज की पुण्य तिथि पर संघ द्वारा दिसंबर माह में भंडारे व विभिन्न प्रतियोगिताओ का आयोजन और पथ भ्रमण किया जाता है। पांडवखोली के पूर्व में भरतकोट, पश्चिम में सुखा देवी मंदिर जो कुकुछीना व दूनागिरी मंदिर के बीच में स्थित है। उत्तर में मनसा देवी व दक्षिण में आदिशक्ति मां दूनागिरी का मंदिर स्थित है। अपार वन संपदा से घिरे क्षेत्र में दुर्लभ जड़ी बूटियां पाई जाती हैं।
सरकार से अपेक्षा है कि इन खूबसूरत धार्मिक स्थलों को विकसित किया जाए, जिससे ऐतिहासिक काल के साक्ष्यों को संजोया जा सके। साथ ही राज्य में पर्यटन की संभावनाओं के बढ़ने के साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के विकल्प बढ़ें।
(यह लेख रानीखेत में अध्यापक पद पर कार्यरत भुवन बिष्ट ने भेजा है)
