शून्य भेदभाव दिवस : बेटियों को भी चाहिए बेटों की तरह बराबर का सम्मान
मुरादाबाद, अमृत विचार। विश्व स्तर पर हर साल एक मार्च को शून्य भेदभाव दिवस मनाया जाता है। इस दिन महिलाओं के अधिकारों, महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता फैलाने का काम किया जाता है। महिलाओं और लड़कियों को समानता का अधिकार दिलाकर सक्षम बनाने की आवश्यकता है। अगर देखें तो …
मुरादाबाद, अमृत विचार। विश्व स्तर पर हर साल एक मार्च को शून्य भेदभाव दिवस मनाया जाता है। इस दिन महिलाओं के अधिकारों, महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता फैलाने का काम किया जाता है। महिलाओं और लड़कियों को समानता का अधिकार दिलाकर सक्षम बनाने की आवश्यकता है।
अगर देखें तो विश्व भर की संसद में महिलाओं की संख्या के हिसाब से भारत आज भी 103वें पायदान पर खड़ा है, जबकि पड़ोसी देश नेपाल, बंग्लादेश, और पाकिस्तान की संसदों में महिला सांसदों की संख्या कहीं अधिक है। उन्हें हम अपने से भी ज्यादा पिछड़ा मानते हैं। यूएनए की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में प्रत्येक तीन में से एक महिला किसी न किसी प्रकार की हिंसा का अनुभव करती है। उनके जीवन में कहां भेदभाव हो रहा है और इसे कैसे रोका जाए, इस पर सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है।
महिलाएं रच रही नित नये आयाम
भले ही आज हर एक क्षेत्र में बेटियां और महिलायें नए-नए आयाम रच रही हैं। लेकिन, इसके बावजूद जो नजरिया, स्थान और सम्मान पुरुष का है, वह महिलाओं से अभी भी बहुत दूर है। कहीं घर में तो कहीं, नौकरी-पेशे के दौरान बेटियों को यह भेदभाव देखने को मिल ही रहा है। यही कारण है कि आज यानी एक मार्च को विश्व शून्य भेदभाव दिवस के अवसर पर आपकी और हमारी यही चाह रहेगी कि महिलाओं को मिलने वाला सम्मान अब उनसे ज्यादा दूर नहीं रहना चाहिए। महानगर की प्रतिष्ठित महिलाओं ने अमृत विचार की टीम से कुछ इस तरह अपनी बात साझा की।
आज की नारी किसी की मोहताज नहीं
सदर एसडीएम प्रेरणा सिंह ने कहा कि इन सबके बीच ऐसा नहीं है कि समाज में अच्छी खबरें नहीं आती। देर-सबेर महिलाओं से संबंधित ऐसी खबरें भी आती रहती हैं जो नारीवादी विचार के लोगों को अच्छी लगती हैं। तीत और वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने पूरे विश्व में महिलाओं का गौरव बढ़ाया है।
प्रशासन एआरटीओ छवि सिंह चौहान
आजादी के 70 साल में तीनों सेनाओं में महिलाओं का दखल रहा है। प्रशासन, पत्रकारिता, बैंक और अन्य सेवाओं में वे बड़ी भागीदार हैं, फिर भला क्यों अक्सर ये सवाल किसी न किसी रूप में हमारे समाज के आगे मुंह बाये खड़ा रहता है कि महिलाओं के अधिकार क्या और कितने हों। इस मानसिकता से उबरने की आवश्यकता है।
शिक्षक डा. सुधा सिरोही
मेरा एक भाई है। मेरे पिता जी ने हम दोनों में कभी भेदभाव नहीं किया। जबसे मैंने स्कूल में पढ़ाना शुरू किया है। वहां की लड़कियों के साथ भेदभाव ही देखा है। उनके माता-पिता लड़कियों से ज्यादा लड़कों को महत्व देते हैं। कोरोना वायरस की वजह से आनलाइन क्लास में दिया गया वर्क भी लड़िकयां नहीं कर पा रही हैं। क्योंकि उनके माता-पिता उन्हें मोबाइल फोन उप्लब्ध नहीं करा पा रहे हैं।
निजी चिकित्सक डा. पूनम सिंह
समाज में महिलाओं को एक दिन के लिए पूजनीय और सम्मान देने तक सीमित कर दिया गया है। यह न केवल महिलाओं के संघर्षों के महत्व अैर इतिहास को खत्म करता है, बल्कि उन्हें उनकी स्वतंत्र पहचान से भी वंचित करता है। महिलाओं को वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसकी वे वास्तव में अधिकारी हैं।
